सोमवार, नवंबर 22, 2010

मां की याद

धुओं से तरबतर
चुल्हे को फूंकती
रोटी बेलती
और फिर उसे सेक कर खिलाती
भूख नहीं रहने पर भी
कौआ, मेना का कौर बनाती
मना करने पर
प्यार से डांटती
ज़िद करने पर
दुलार कर खिलाती
अब जब भूखा सो जाता हूं
तो सब कुछ याद आता है
उसका वो डांटना
अब रूलाता है.....

शनिवार, नवंबर 20, 2010

ये किसी की हक़ीकत है


मुलाकात
बातें
प्यार
विश्वास
समर्पण
धोखा
ब्लैकमेलिंग
दर्द
फरियाद
फजीहत
बेबसी
खुदकुशी ।।
                पहली बार उन दोनों की नज़रें शर्माते हुए मिली थी। फिर शुरू हुआ बातों का सिलसिला। ये बातें दोस्ती में बदल गई। दोनों चहचहा कर मिलने लगे। फिर शुरू हुआ प्यार का खेल। दोनों के दोस्ती के बीच विश्वास का जो पुल बना,वो भीतर से खोखला था। लेकिन लड़की उसे समझ नहीं पाई। उस पुल के सहारे वो जिंदगी की नहर को पार करने की ठान ली। लड़की ने अपना सबकुछ लड़के को समर्पित कर दिया। लेकिन लड़का तो फरेबी निकला। उन्होंने लड़की का एमएमएस बना डाला। और फिर ब्लैकमेल करने लगा। एक हंसती खेलती ज़िदगी की फजीहत हो गई। वो बेबस हो गई। उन्होंने कई जगहों पर फरियाद की। लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब उसकी ज़िंदगी बोझ लगने लगी। वो बेबस होकर खुदकुशी कर ली। ज़िंदगी खत्म कर ली। ये सिर्फ उसकी व्यथा नहीं है। फरेबी इस संसार में कईयों की कथा है। बस,कुछ दब जाते हैं। कुछ सामने आ जाते हैं।

मंगलवार, नवंबर 16, 2010

ज़िंदगी की क़ीमत

भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी इमारत ने कइयों को लील लिया। खूबसूरत महल मलबों की ढेर में तब्दील हो गया। मकान कब्रिस्तान बन गया। ज़िंदगी दफ्न हो गई। कई परिवार कभी ना उबरने वाले ज़ख्म के समंदर में डूब गये। तबाही कभी बता कर नहीं आती। अचानक आती है। ये सब कुछ भी अचानक हुआ। अचानक ही मौत ने दस्तक दी। अचानक इमारत गिरी और अचानक ही सालों का ख्वाब पलभर में बिखर गया।
     जिस घर में रहकर ज़िंदगी का तानाबाना बुना करते थे, वही मौत का कारण बन गया। सपनो का महल हकीकत में भरभरा कर गिर गया। देखते ही देखते सब कुछ खत्म हो गया। ठहाकों की गुंज चीख में बदल गई। दिल का दर्द आँसू बहकर निकलने लगा। किसी का बाप नहीं रहा, किसी का भाई, किसी की मां तो किसी की पत्नी नहीं रही। किसी किसी का तो पूरा परिवार ही असमय काल के गाल में समा गया। सुबह होते होते कई जिंदगी दस्तावेज में सिमट कर रह गयी। अस्पतालों में लोग अपने परिजनों को फोटे के ज़रिये पहचानने की कोशिश करने लगे। अस्पतालों में अब भी लाशों की ढेर लगी है। कुछ मुर्दा है तो कुछ ज़िंदा लाश। जिनकी आंखें सूनी है। आँसू सूख चुका है। घाव बेदर्द हो चुका है। ज़िंदगी जिल्लत लग रही है। क्योंकि इनमें से कई लोग ऐसे हैं जिनका अब अपना कोई नहीं रहा।
        मौत की कोई मुकम्मल तादाद सामने नहीं आई। बस, एक अनुमान आया। मौत का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस मकान में ये हादसा उसमें चालीस परिवार अपने बाल बच्चों के साथ रहते थे। ये कोई पहला या आखिरी मकान नहीं था। शहर में ऐसे कई मकान हैं जहां ऐसे सैकड़ो परिवार रहते हैं। जब उनलोगों ने टीवी इस हादसे की पहली तस्वीर देखी, तो कलेजा हाथ में आ गया। छत की ओर देखने लगे। सासें थम गई। सोच में पड़ गये। एक अनहोनी दिमाग में दौड़ने लगा। लेकिन मजबूरी और जरूरी के बीच सबकुछ भूलकर सो गये।
       अब जब सबकुछ खत्म हो गया, तो जांच का ऐलान हुआ। हर बार की तरह ज़िंदगी की कीमत लगा दी गई। मर गये तो दो लाख। घायल हो गये तो पचास लाख। जिस समय ये ऐलान हो रहा था, उस समय शासक का आत्मविश्वास देखने लायक था। वो इस अंदाज़ में अपनी बात कह रही थी, मानों मरने वालों को ज़िंदगी लौटा रही हो। शायद उन गरीबों के लिए ये रकम बहुत ज्यादा हो। लेकिन क्या उनके साथ अगर ऐसा हो तो......नहीं भगवान ना करें। क्योंकि जिंदगी सबको एक ही जगह से मिलती और अपने परिवार के लिए उसकी अहमियत भी उतनी ही......

गुरुवार, अक्टूबर 28, 2010

बेपर्दा होती जुबान

राजनीति में मर्यादाओं की लकीरें पतली होती जा रही है। जुबानी जंग में आगे निकलने की होड़ आ पड़ी है। द्वेष और खेद के बीच हर दिन नई सीमाएं बनती है और फिर उसे तोड़ दी जाती है। इसमें सबसे आगे वे स्वयंभू समाजवादी हैं,जो खुद को जेपी का अनुयायी बताते हैं। बिहार विधान सभा चुनाव के गहमागहमी के बीच पहले शऱद यादव ने और फिर रामविलास पासवान ने समाजवादियों की उम्मीदों को तार-तार कर दिया।
         सवाल उठता है कि नेताओं के बयानों का स्तर गिरता क्यों जा रहा है। दरअसल जब विचारों में मिलावट और शब्दों में कमी हो जाती है तो भाषा का स्तर गिर जाता है। आज के दौर में ज्यादातर नेता कमोबेश इसी स्थिति से गुजर रहे हैं। उनके पास ऐसी कोई रणनीति नहीं है, जिससे वो विपक्षी को घेर सके अथवा जनता के मन में खुद के लिए विश्वास पैदा कर सके। वो समाज के वास्तविक मुद्दों को छूना नहीं चाहते हैं। क्योंकि हर किसी का घर शीशे का है। ऐसे में उन्हें चर्चा में बने रहने के लिए तल्ख मिजाज होना जरूरी है और मजबूरी भी। नहीं तो आधुनकि राजनीति में नई मिसाल पेश करने वाले यूथ आईकॉन राहुल गांधी को ना तो शरद यादव गंगा में फेंकने की बात कहते और ना ही रामविलास पासवान, उस बीजेपी और आडवाणी को पाप की पोटली करार देते, जिसकी सरकार में रहकर वो पांच सालों तक राजनीति की दिशा तय करते रहे।
       इन बातों से साफ है कि राजनीति सिर्फ विलासिता का माध्यम बनकर रह गया है। ऐसे में कुर्सी की चाहत उसे हर स्तर तक पहुंचने को मज़बूर कर देती है। नेताओं की जुबान की धार उस समय और तेज़ हो जाती है, जब कोई ख़ास मौक़ा हो। और अभी बिहार में चुनावों का दौर जारी है। यहां पर नेताओं का जमाबड़ा लगा हुआ। ऐसे में कोई चूकना नहीं चाहता है। अगर इसी तरह सियासी तापमान गरमाता रहा तो ना जाने और कितने समाजवादियों की जुबान बेपर्दा होगी।

मंगलवार, अक्टूबर 26, 2010

वो...

गली के मोड़ पर

पहलीबार
वो मुझे
दिखी थी
बिल्कुल शर्मिली शी,
एक-दूसरे की
नज़रें मिली
और वो आगे बढ़ गई..
लेकिन वो
नींद में रंगीन ख्वाब बनकर
मेरी आंखों में तैरने लगी,
मेरी उम्मीदें
उससे मिलने को बेताब थी,
इंतजार...
एक दिन फिर
वो मुझे अचानक
उसी मोड़ पर मिली,
हिचकिचाते हुए
मैंने उसका नाम पूछा...
बस
यूं ही हम दोनों में
शुरू हुआ बातों का सिलसिला
दोस्ती तक पहुंच गई,
अक्सर हम दोनों मिलने लगे,
कब हम दोनों की दोस्ती
प्यार में बदल गई
हमें भी नहीं पता चला,
लेकिन जब जाना
तो जाना कि
हम खुद के भी नहीं रहे,
मैं उस राजा के जैसा हो गया
जिसकी जान
एक चिड़िया में बसती थी,
मेरी ज़िंदगी भी
उसी की होकर रह गई थी,
मेरा लहू
उसके नसों में दौड़ने लगा
हम दोनों
दो जिस्म मगर
एक जान हो गए,
वो रोज मुझसे मिलती थी
घंटों प्यार की बातें होती थी
वो अपना सबकुछ
हमारे पास छोड़ जाती थे,
हां, मैंने उससे कभी
चांद तारे तोड़ लाने का
झुठा वादा नहीं किया,
सात जनमों तक साथ निभाने की
कसमें भी नहीं खाई
बस प्यार ही प्यार करता रहा
एक-दूसरे से.......

सोमवार, अक्टूबर 04, 2010

धुआं-धुआं लोकतंत्र

बिहार में सियासी पारा 200 डिग्री सेल्सियस के पार है। विरोध की तपिश से पार्टी दफ्तरों में आग लगने लगी है। धू-धू कर जला रहा है पार्टी ऑफिस और धुआं-धुआं हो रहा है लोकतंत्र। समय के साथ जुमला और उसका अर्थ बदल जाता है। अब राजनीति में सबकुछ जायज़ होने लगा है। लोगों की मानसिकता बदली है। विरोध का स्वरूप भी। बात नहीं सुनी तो आग लगा दी। भले ही आग की लपटें लगाने वालों के इर्द गिर्द ही क्यों ना रह जाए। हलांकि ख़बरिया चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज़ के साथ चेहरा भी दिखाया जाता। दो शब्द बोलने का मौक़ा भी। फिर ये मौक़ा मिले ना मिले। तभी तो इसे कोई गंवाना नहीं चाहता। मैथिली में एक कहावत है-सुकर्मे नाम या कुकर्मे नाम (कुछ अच्छा करो तभी नाम होगा या बुरा करो तभी)। अच्छा करने के लिए पार्टी टिकट नहीं दे रही तो भला क्या करे। कुछ तो करना है। नाम और पहचान में बहुत गहरा संबंध है।
              विरोध के कई रंग हैं। कोई आग लगाता है। कोई तोड़फोड़ करके। कोई नारेबाजी से काम चलाता है, तो किसी का गुस्सा ज्यादा बढ़ा तो पार्टी अध्यक्ष पर हमला तक कर दिया। लेकिन विरोध की एक और तस्वीर भी है। ज़रा इसे भी समझिए। लोग इसे नंग धड़ंग प्रदर्शन कहते हैं। जब अगलगी और तोड़फोड़ से कुछ होता नहीं दिखा तो अंतिम प्रयास कर लिये। कपड़े तक उतार डाले। दिन में ही सबके सामने बेलिबास हो गये। कपड़ा खोल कर प्रदर्शन करने लगे। टिकट तो लेकर ही जायेंगे।
          गांधीजी लोगों को कम वस्त्र पहने का उपदेश देते-देते चले गये। किसी ने नहीं माना। लेकिन टिकट ने ज़मीन पर ला खड़ा किया। काश ये नुस्खा गांधी बाबा को पहले पता होता तो आज देश में कोई नंगा नहीं घुमता। हलांकि बड़े लोगों के परिवार में बहु बेटियों का कम कपड़े में घुमना फैशन ज़रूर है। लेकिन पुरुषों में नहीं। यहां तो घर के मर्दों ने ही कपड़े उतार दिये थे। टिकट के लिए। सरेआम। बेपर्दा हो गये थे। कपड़ो का पर्दा सबके लिए ज़रूरी होता है। चाहे वो औरत हो या मर्द। क्योंकि बात शर्म, हया, मान और सम्मान की होती है। लेकिन जहां बात नेता और टिकट की हो तो बीच में इन सब बातों की गुंजाइश कहां बचती है। नेताजी आपको सलाम।
       ये हंगाम करने वाले लोग कौन थे। मैं नहीं जानता। लेकिन इतना तय था कि ये प्रोजेक्टेड नेता थे। हंगामा करने वाले, नेताजी के शुभचिंतक हैं या नेताजी ने इन्हें खर्चा-पानी देकर भेजा है। मैं ये भी नहीं जानता। लेकिन ज़रा सोचिए। जो आदमी टिकट के लिए अपने दफ्तर में आग लगा सकता है,  नंगा नाच सकता है तो उसका नेता अगर जीत गया तो क्या-क्या करेगा। 

रविवार, अक्टूबर 03, 2010

आंधी

एक आंधी
अचानक उठी,
उजड़ गए
सैकड़ों घर,
बेकाम हो गए
हज़ारों हाथें,
उड़ा ले गई
आंखों की नींदें,
गायब हो गए
शहर से
एक-एक परिंदे,
आंधी थमने पर,
धूल छटने के बाद,
एक रात मैंने देखा,
चमचमाते शहर में
बेलिबास,
भूखे पेट,
डिवाइडर पर सोये
मज़दूरों की टोली,
आंधी का
ये रूप देखकर
थम गई
मेरी सांसें,
मैं सोचने लगा,
ये कैसी आंधी ?
तभी पीछे से
एक आवाज़ आई
ये आंधी कोई आइला,
कैटरीना या सुनामी नहीं थी,
ये आंधी प्रगतिवादी थी ।।