मंगलवार, नवंबर 16, 2010

ज़िंदगी की क़ीमत

भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी इमारत ने कइयों को लील लिया। खूबसूरत महल मलबों की ढेर में तब्दील हो गया। मकान कब्रिस्तान बन गया। ज़िंदगी दफ्न हो गई। कई परिवार कभी ना उबरने वाले ज़ख्म के समंदर में डूब गये। तबाही कभी बता कर नहीं आती। अचानक आती है। ये सब कुछ भी अचानक हुआ। अचानक ही मौत ने दस्तक दी। अचानक इमारत गिरी और अचानक ही सालों का ख्वाब पलभर में बिखर गया।
     जिस घर में रहकर ज़िंदगी का तानाबाना बुना करते थे, वही मौत का कारण बन गया। सपनो का महल हकीकत में भरभरा कर गिर गया। देखते ही देखते सब कुछ खत्म हो गया। ठहाकों की गुंज चीख में बदल गई। दिल का दर्द आँसू बहकर निकलने लगा। किसी का बाप नहीं रहा, किसी का भाई, किसी की मां तो किसी की पत्नी नहीं रही। किसी किसी का तो पूरा परिवार ही असमय काल के गाल में समा गया। सुबह होते होते कई जिंदगी दस्तावेज में सिमट कर रह गयी। अस्पतालों में लोग अपने परिजनों को फोटे के ज़रिये पहचानने की कोशिश करने लगे। अस्पतालों में अब भी लाशों की ढेर लगी है। कुछ मुर्दा है तो कुछ ज़िंदा लाश। जिनकी आंखें सूनी है। आँसू सूख चुका है। घाव बेदर्द हो चुका है। ज़िंदगी जिल्लत लग रही है। क्योंकि इनमें से कई लोग ऐसे हैं जिनका अब अपना कोई नहीं रहा।
        मौत की कोई मुकम्मल तादाद सामने नहीं आई। बस, एक अनुमान आया। मौत का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस मकान में ये हादसा उसमें चालीस परिवार अपने बाल बच्चों के साथ रहते थे। ये कोई पहला या आखिरी मकान नहीं था। शहर में ऐसे कई मकान हैं जहां ऐसे सैकड़ो परिवार रहते हैं। जब उनलोगों ने टीवी इस हादसे की पहली तस्वीर देखी, तो कलेजा हाथ में आ गया। छत की ओर देखने लगे। सासें थम गई। सोच में पड़ गये। एक अनहोनी दिमाग में दौड़ने लगा। लेकिन मजबूरी और जरूरी के बीच सबकुछ भूलकर सो गये।
       अब जब सबकुछ खत्म हो गया, तो जांच का ऐलान हुआ। हर बार की तरह ज़िंदगी की कीमत लगा दी गई। मर गये तो दो लाख। घायल हो गये तो पचास लाख। जिस समय ये ऐलान हो रहा था, उस समय शासक का आत्मविश्वास देखने लायक था। वो इस अंदाज़ में अपनी बात कह रही थी, मानों मरने वालों को ज़िंदगी लौटा रही हो। शायद उन गरीबों के लिए ये रकम बहुत ज्यादा हो। लेकिन क्या उनके साथ अगर ऐसा हो तो......नहीं भगवान ना करें। क्योंकि जिंदगी सबको एक ही जगह से मिलती और अपने परिवार के लिए उसकी अहमियत भी उतनी ही......

1 टिप्पणी:

  1. काश ये पैसा पहले खर्च किया होता - लुटेरों से भरो सरकार से क्या उम्मीद करोगे ?

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