सोमवार, जुलाई 25, 2011

यही राजनीति है.....

कभी खुद को रॉबिन हूड से तुलना करने वाले लालू प्रसाद यादव राजनीति के हाशिए पर खड़े हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद से लालू और उनकी पार्टी मजधार में फंसी है। जो लालू कभी केन्द्र में सरकार बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते फिरते थे, वो आज खुद एक अदद मंत्री बनने के लिए सोनिया गांधी के घर का चक्कर काट रहे हैं। बिहार के जिन नेताओं आसरे लालू हूंकार भरते थे, आज वे एक एक कर उनका साथ छोड़ रहे हैं। जब तक लालू राजनीति के शेर थे। दहाड़ रहे थे। तो तमाम चाटुकार उनके आगे पीछे दूम हिलाते फिरते थे। लेकिन शेर बूढ़ा क्या हुआ, उनके नाम पर सत्ता का सुख भोगने वाले एक एककर दूम दबाकर भागने लगे।

बिहार में ही राष्ट्रीय जनता दल की ये स्थिति होगी, लालू ने कभी सोचा भी नहीं था। लालू ने बिहार की राजनीति में जो चाहा, जब चाहा, उसे डंके की चोट पर कर दिखाया। जिसको चाहा नेता बना दिया। जिसको चाहा मटियामेट कर दिया। शरद यादव ने बात नहीं मानी तो अलग पार्टी बना ली। विरोधी मिमियाते रहे और लालू राज करते रहे। लेकिन समय बदला। लोगों का मिज़ाज बदला। और लालू का राज बदल गया। एक बार कुर्सी क्या गई, मानों मौक़ापरस्ती की रानजनीति करने वाले बिहार के नेताओं ने रंग बदलना शुरू कर दिया। जिन नेताओं को लालू ने नाम दिया। पहचान दी। राजनीति का पाठ पढ़ाया। आज उन्हीं लोगों को लालू की नीति अच्छी नहीं लग रही है। वे उन्हें ही नसीहतें दे रहे हैं। साथ छोड़ रहे हैं।

दरअसल यही राजनीति है। जिसके पास सत्ता होती है। पावर होता है। उसी का सबकुछ होता है। लोकतंत्र के नाम पर कुर्सी का खेल करनेवालों के लिए ये एक कड़वी सच्चाई है। ये संकेत हैं उन तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के लिए, जो निजी कंपनी की तरह चलाया जाता है। जो पार्टियां एक ही परिवार के आसरे चलती है। उसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और कार्यकर्ताओं का चुनाव राजतंत्र सरीखे होता है। मसलन बिहार में राजद, जदयू, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी, उड़ीसा में बीजू जनता दल, तमिलनाडू में डीएमके और एआईडीएमके, कर्नाटक में दनतादल सेक्यूलर, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाले तेलगू देशम पार्टी। इन तमाम पार्टियों की अगुवाई एक ख़ास शख्स के द्वारा किया जाता है। जिसे वो चाहता है, उसे वहां तक पहुंचा देता है। लालू यादव ने भी यही काम किया। जिसका खामिया आज उन्हें भुगतना पड़ रहा है।

रविवार, दिसंबर 12, 2010

पटना पुस्तक मेला २०१०

पटना के गांधी मैदान में किताबों का महाकुंभ लगा है। जबर्दस्त भीड़ जुट रही है। तरह-तरह की किताबें बिक रही है। स्कूली किताब से लेकर साहित्य, रोमांस, इतिहास की किताबें। अगर आप रोमांटिक आदमी हैं और उम्रदराज होकर कुछ कर गुजरना चाहते हैं तो जूली-मटूक की डायरी भी मिल रही है। हां, गीता की बिक्री कम या नहीं के बराबर है। एक विदेशी हाथ में लेकर घूम घूम कर बेच रहा था। एक लेखक देश की भी चिंता है। वैसे इश्क लड़ाने वालों के लिए भी कम मनमाफित जगह नहीं है। आईलवयू करने वाले लोग भी खूब घूम रहे हैं। किताब देखने वालों से ज्यादा किताब देखने वाले को देखनेवालों की भीड़ है। पुस्तक मेला में हर तरह के प्रोडक्ट बेचे जा रहे हैं। किताबों के साथ-साथ पॉपकॉर्न भी खूब बिक रहे हैं। दिसम्बर महीने में भी कोकाकोला की बिक्री है। एक बात और ख़ास है। यहां पर 12 दिनों में पत्रकार बना दिये जाते हैं। इंजीनियरिंग, मेडिकल, और समान्य कंपिटिशन के लिए प्राइवेट इंस्टीट्यूटों के बीच जबर्दस्त कंपिटिशन है। कुछ तस्वीरों के जरिये हम आपको दिखाते हैं।










सोमवार, दिसंबर 06, 2010

लॉज का रोमांस

लोगों ने प्राइवेट हॉस्टल के नाम को ओवरहॉलिंग करते-करते लॉज बना दिया। जो छोटे बड़े हर शहर के गली मुहल्ले में मिल जाएंगे। जहां रेगिस्तान के वक्ष पर हराभरा सुनहरा जंगल बसाने की ख्वाहिस लिए लाखों बच्चे रहते हैं। वही बच्चे जो बगिया से टूटकर मुरझाये हुए फुलों की तरह सालों तक निर्वासित जीवन व्यतित करते हैं।

शुरू-शुरू में ये किसी सज़ा से कम नहीं होता। लेकिन मजबूरी इसे मजा में बदल देती है। शुरू होता है ज़िंदगी का एक नया ड्रामा। उस ड्रामे में सबकुछ है। इमोशन है। प्यार है। एक्शन भी और सबसे ज्यादा भविष्य के गर्भ में छुपा ज़िंदगी का सस्पेंस भी। जहां कई कठोर निर्णय खुद लेने पड़ते हैं। जहां हर कदम फिसलनदार ज़मीन पर रखना पड़ता है। खुद को खुद से संभालना पड़ता है।

धीरे-धीरे बच्चे इस लॉज को अपना सबकुछ बना लेते हैं। 12 बाइ 12 के रूम की तुलना मुकेश अंबानी के एंटिलिया से होने लगती हैं। एक ही कमरा में पूरा फ्लैट। एक तरफ मां सरस्वती का फोटो तो दूसरी ओर बलखाती, इतराती, मुस्कुराती अर्धनग्नावस्था में किसी हिरोइन का पोस्टर। जो आशिकिया मिज़ाज को पुख्ता करता है। रूम पार्टनर पारिवारिक सदस्य हो जाते हैं। जिससे कभी रोटी की दोस्ती तो कभी भात का बैर। जो भी हो, बीमार पड़ने पर दवा तो वही लाकर देता है।

इस सब के बावजूद एक बात ख़ास होती है। वो ये कि यहां हर कोई एक दूसरे को निकृष्ट जीव समझता है। हर कोई एक दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है। एक ऐसी सोच जनती है जहां खुद को क्रेजी साबित करने की होड़ लगी रहती है। फ्लर्ट करने की हसरत लिए सच्ची झूठी कहानी गढ़ी जाती है।

यहां के रहन-सहन में कोई बंधे बंधाये नियम नहीं होते। कोई कसाव नहीं होता। हर काम में स्वच्छंदता रहती है। एक बिखरी हुई सी अनियमितता रहती है। जहां हर दिन एक रूटीन चार्ट बनता है। शाम होते-होते उसमें परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, अगले दिन रुटीन खत्म और अगले सप्ताह फिर से नया चार्ट बनकर तैयार हो जाता है।

मीडिल क्लास फैमिली के बच्चे यहां आकर मनी मैनेजमेंट में पक्के हो जाते हैं। दो हज़ार रुपये में पूरा महीना मैनेज करने की कला कोई इनसे सीखें। मेस चलाना है। ट्यूशन फी देना है। कॉपी और किताब भी खरीदनी है। और फिल्म का खर्चा भी निकालना है। पैसा जोड़-जोड़ इकट्टा करके फिल्म देखने का उत्साह, इंसा अल्लाह। रिलिजिंग डेट पर फिल्म देखने का मजा यहां के बच्चों से ज्यादा भला कौन जान सकता है। जेब में पैसा रहे ना रहे, रूतबा तो मुमताज के शाहजहां वाला चाहिए ही। तभी लड़की भी पटेगी।

लॉज में दिन की शुरुआत बड़े ही मजेदार तरीके से होती है। आंख मलते हुए ट्वायलेट जाना। नंबर लगाना पड़ता है। क़िस्मत अच्छी रही तो जल्दी, वरना कभी-कभी फिर से एक नींद सोकर उठ जाइये, तब नंबर आयेगा। तभी तो स्वयंभू स्मार्ट लड़के आठ बजे के बाद ही सोकर उठने की चालाकी करते हैं। लेकिन स्नान करने के समय तो यहां पूरा समाजवाद दिखता है। सिक्स पैक बॉडी की तमन्ना रखने वाले तमान बच्चे जब एक साथ नहाने के लिए जमा होते हैं तो देखते ही बनाता है।

गैस ने हॉस्टल में नई क्रांति ला दी। स्टोव की सनसनाहट बंद हो गये। हां, कुकर की सिटी जरूर आवाज लगाती है। एक ही साथ कई कमरे से आवाज निकलती है। एक ही बार में बीडीसी बनकर तैयार। बीडीसी, यानी भात, दाल, चोखा की छात्रप्रियता में आज भी कोई कमी नहीं आई है। ये आज भी छात्रों का फेवरेट है। फटाफट एक ही साथ बनकर तैयार। मन किया तो छौंका लगा दिया, नहीं तो थाली भरकर भात, उसके उपर आलू का चोखा और बाटी में दाल। खाते समय किसी फाइव स्टार होटल से कम स्वादिष्ट नहीं लगता। यहां के खाने में एक और ख़ासियत होता है कि यहां कुछ भी ज्यादा नहीं बनता। जो भी बनता है, सबका उदरभाजन हो जाता है।

खैर, जो भी हो इस सब के बावजूद यहीं बुना जाता है जिंदगी का तानाबाना, सपनों में लगते हैं पंख। कोई इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करता है। कोई मेडिकल की परीक्षा पास करता है। यहीं कोई मैनेजमेंट की तैयारी का निर्णय लेता है तो कोई जेनरल कंपिटिशन में क़िस्मत आजमाने के लिए घुस जाते हैं।

मंगलवार, नवंबर 23, 2010

राहुल और सोनिया पर घोटाले का आरोप नहीं है....

इस साल देश में कुछ ही दिनों के अंतराल में एक एक कर पांच घोटालों का पर्दाफाश हुआ। ख़ास बात है कि पांच में से चार घोटलों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस शामिल रही है। वही कांग्रेस जिसका नारा है "कांग्रेस का हाथ,आम आदमी के साथ"। वही कांग्रेस जिसके नेता राहुल गांधी युवाओं के जरिये कुर्सी पर काबिज होकर देश को नई दशा और दिशा तय करने में जुटे हैं। काबिल-ए-गौर है कि इन तमाम घोटालों में तथाकथित युवा नेताओं का नाम आ रहा है।
         सबसे पहले बात करते हैं देश के अब तक के सबसे बड़े टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की। कांग्रेस की सरकार में संचार मंत्री रहे ए राजा पर एक लाख सत्तर हजार करोड़ रूपयों के घोटाले का आरोप है। विपक्ष के दबाव में राजा को इस्तीफा देना पड़ा। हलांकि राजा डीएमके के नेता हैं, लेकिन वो मंत्री कांग्रेस सरकार में हैं। साथ ही जब विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहा था तो कांग्रेसी नेता राजा का बचाव कर रहे थे।
        इस साल का दूसरा सबसे बड़ा घोटाला कॉमन वेल्थ गेम्स में सामने आया है। जो लगभग 87 हजार करोड़ के आसपास का है। इसमें भी कांग्रेसी नेताओं पर आरोप लगे हैं। ख़ासकर सुरेश कलमाड़ी पर। जो भारतीय कॉमन वेल्थ गेम्स के अध्यक्ष भी हैं। और कांग्रेस के सांसद भी। यहां भी किरकीरी होने पर कांग्रेस, कलमाड़ी पर कार्रवाई कर चुकी है।
      ऐसे ही खेल से ही जु़ड़ा दूसरा मामला है इंडियन प्रीमियर लीग का। इस मामले में फंसकर कांग्रेस के तेजतर्रार नेता और मंत्री शशि थरूर अपना इस्तीफा दे चुके हैं। पार्टी को इस मामले में कितनी फजीहत हुई, इसे कहने की ज़रूरत नहीं है।
        और सबसे ताज़ा मामला आदर्श सोशाएटी घोटाले का है। जिसका आरोप महाराष्ट्र के तत्कालिन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण पर लगे हैं। चव्हाण को भी इस्तीफा देना पड़ा। ख़ास बात ये है कि चव्हाण महाराष्ट्र के पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं हैं, जिन पर घोटाला का आरोप लगा है। ए आर अंतुले, सुशील कुमार शिंदे जैसे कई दिग्गजों के दामन घोटलों के आरोप में दागदार हो चुके हैं।
           गिनती यहीं पर आकर खत्म नहीं होती है। फेहरिस्त काफी लंबी है। अगर थोड़ा और भी पुराने फाइलों को खंगालें तो कई और नाम कांग्रेस को शर्मसार करते नज़र आएंगे। पहले बात बोफोर्स घोटाले की। जिसमें कांग्रेस के सबसे युवा और सशक्त प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर आरोप लगा था। उसके बाद हवाला कांड सामने आया तो उसमें पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव पर आरोप लगे। इतना ही नहीं, नरसिम्हा राव पर तो सरकार बचाने के लिए खरीद फरोख्त का भी आरोप है। इसके अलावा पूर्व संचार मंत्री पंडित सुखराम घोटाले के आरोप जेल जा चुके हैं। पहली बार सुखराम के बेड के नीचे से ही पैसा निकला था। इराक का तेल के बदले डॉलर घोटाले में काग्रेस के वरिष्ठ मंत्री नटवर सिंह और उनके परिजन पर आरोप हैं। जिसके बाद नटवर सिंह को विदेश मंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी। अर्जुन सिंह सरीखे कई नेताओं पर भी घोटालों के आरोप है।
    इनके अलावा वर्तमान राजनीति के और भी कई दिग्गज हैं जो घोटाले को अपने दामन में छुपाये सत्ता के सहारे आदर्शवाद का मुखौटा पहने घूम रहे हैं या इस दुनिया से विदा हो गये हैं। वैसे आरोप तो यहां तक है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री ललित नारायण मिश्रा की हत्या इसलिए हुई थी क्योंकि उन्हें जानकारी थी कि संजय गांधी ने कहां हेरफेर किया है। हलांकि इसका कोई लिखित तौर पर पुख्ता प्रमाण नहीं हैं।
     अब थोड़ा इससे आगे बढ़ते हैं। बात चारा घोटाला का करते हैं। जिसके नायक लालू प्रसाद यादव थे। उन्हें कांग्रेस का समर्थन हासिल था। हलांकि चारा घोटाले में पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा भी आरोपी हैं।
     इसी तरह 2009 में सामने आया कोड़ा घोटाला मामला। एक नवनिर्मित और गरीब राज्य के मुख्यमंत्री ने तब घोटालों का सारा रिकॉर्ड तोड़ दिया था। मधु कोड़ा ने पूरे दस हजार करोड़ का गबन कर लिया था। एक निर्दलीय मुख्यमंत्री को कांग्रेस का समर्थन था। वैसे भी जिस तरह कोड़ा ने विदेशों में पैसा भेजा वो केन्द्र सरकार के जानकारी के बिना संभव नहीं है। और केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी।
        इन तमाम बातों से इतना तो साफ है कि जितने भी बड़े घोटाले हुए हैं उसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस शामिल रही है। लेकिन इस सब के बावजूद देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी के लिए एक राहत की बात ये है कि राहुल और सोनिया गांधी पर घोटालों के आरोप नहीं लगे हैं। लेकिन विपक्ष ये भी कहने से गुरेज नहीं कर रहा है कि कई घोटाले इन दोनों के संरक्षण के बिना संभव नहीं हुआ।

सोमवार, नवंबर 22, 2010

मां की याद

धुओं से तरबतर
चुल्हे को फूंकती
रोटी बेलती
और फिर उसे सेक कर खिलाती
भूख नहीं रहने पर भी
कौआ, मेना का कौर बनाती
मना करने पर
प्यार से डांटती
ज़िद करने पर
दुलार कर खिलाती
अब जब भूखा सो जाता हूं
तो सब कुछ याद आता है
उसका वो डांटना
अब रूलाता है.....

शनिवार, नवंबर 20, 2010

ये किसी की हक़ीकत है


मुलाकात
बातें
प्यार
विश्वास
समर्पण
धोखा
ब्लैकमेलिंग
दर्द
फरियाद
फजीहत
बेबसी
खुदकुशी ।।
                पहली बार उन दोनों की नज़रें शर्माते हुए मिली थी। फिर शुरू हुआ बातों का सिलसिला। ये बातें दोस्ती में बदल गई। दोनों चहचहा कर मिलने लगे। फिर शुरू हुआ प्यार का खेल। दोनों के दोस्ती के बीच विश्वास का जो पुल बना,वो भीतर से खोखला था। लेकिन लड़की उसे समझ नहीं पाई। उस पुल के सहारे वो जिंदगी की नहर को पार करने की ठान ली। लड़की ने अपना सबकुछ लड़के को समर्पित कर दिया। लेकिन लड़का तो फरेबी निकला। उन्होंने लड़की का एमएमएस बना डाला। और फिर ब्लैकमेल करने लगा। एक हंसती खेलती ज़िदगी की फजीहत हो गई। वो बेबस हो गई। उन्होंने कई जगहों पर फरियाद की। लेकिन कुछ नहीं हुआ। अब उसकी ज़िंदगी बोझ लगने लगी। वो बेबस होकर खुदकुशी कर ली। ज़िंदगी खत्म कर ली। ये सिर्फ उसकी व्यथा नहीं है। फरेबी इस संसार में कईयों की कथा है। बस,कुछ दब जाते हैं। कुछ सामने आ जाते हैं।

मंगलवार, नवंबर 16, 2010

ज़िंदगी की क़ीमत

भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी इमारत ने कइयों को लील लिया। खूबसूरत महल मलबों की ढेर में तब्दील हो गया। मकान कब्रिस्तान बन गया। ज़िंदगी दफ्न हो गई। कई परिवार कभी ना उबरने वाले ज़ख्म के समंदर में डूब गये। तबाही कभी बता कर नहीं आती। अचानक आती है। ये सब कुछ भी अचानक हुआ। अचानक ही मौत ने दस्तक दी। अचानक इमारत गिरी और अचानक ही सालों का ख्वाब पलभर में बिखर गया।
     जिस घर में रहकर ज़िंदगी का तानाबाना बुना करते थे, वही मौत का कारण बन गया। सपनो का महल हकीकत में भरभरा कर गिर गया। देखते ही देखते सब कुछ खत्म हो गया। ठहाकों की गुंज चीख में बदल गई। दिल का दर्द आँसू बहकर निकलने लगा। किसी का बाप नहीं रहा, किसी का भाई, किसी की मां तो किसी की पत्नी नहीं रही। किसी किसी का तो पूरा परिवार ही असमय काल के गाल में समा गया। सुबह होते होते कई जिंदगी दस्तावेज में सिमट कर रह गयी। अस्पतालों में लोग अपने परिजनों को फोटे के ज़रिये पहचानने की कोशिश करने लगे। अस्पतालों में अब भी लाशों की ढेर लगी है। कुछ मुर्दा है तो कुछ ज़िंदा लाश। जिनकी आंखें सूनी है। आँसू सूख चुका है। घाव बेदर्द हो चुका है। ज़िंदगी जिल्लत लग रही है। क्योंकि इनमें से कई लोग ऐसे हैं जिनका अब अपना कोई नहीं रहा।
        मौत की कोई मुकम्मल तादाद सामने नहीं आई। बस, एक अनुमान आया। मौत का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस मकान में ये हादसा उसमें चालीस परिवार अपने बाल बच्चों के साथ रहते थे। ये कोई पहला या आखिरी मकान नहीं था। शहर में ऐसे कई मकान हैं जहां ऐसे सैकड़ो परिवार रहते हैं। जब उनलोगों ने टीवी इस हादसे की पहली तस्वीर देखी, तो कलेजा हाथ में आ गया। छत की ओर देखने लगे। सासें थम गई। सोच में पड़ गये। एक अनहोनी दिमाग में दौड़ने लगा। लेकिन मजबूरी और जरूरी के बीच सबकुछ भूलकर सो गये।
       अब जब सबकुछ खत्म हो गया, तो जांच का ऐलान हुआ। हर बार की तरह ज़िंदगी की कीमत लगा दी गई। मर गये तो दो लाख। घायल हो गये तो पचास लाख। जिस समय ये ऐलान हो रहा था, उस समय शासक का आत्मविश्वास देखने लायक था। वो इस अंदाज़ में अपनी बात कह रही थी, मानों मरने वालों को ज़िंदगी लौटा रही हो। शायद उन गरीबों के लिए ये रकम बहुत ज्यादा हो। लेकिन क्या उनके साथ अगर ऐसा हो तो......नहीं भगवान ना करें। क्योंकि जिंदगी सबको एक ही जगह से मिलती और अपने परिवार के लिए उसकी अहमियत भी उतनी ही......