गुरुवार, मई 14, 2009

वरुण एन एस ऐ से मुक्त

आखिरकार उस नाटक का पटाक्षेप हो ही गया....जो प्रायोजित रूप से चुनाव के लिए खेला गया था। इस नाटक में एक अनजान चेहरे को नायक के रूप में सामने लाया गया,,,और और नाटक का अंत होते-होते लोगों ने उसे हिरो बना दिया। चुनाव खतम होने के चार दिन बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने वरूण गांधी के उपर से एन एस ए हटा लिया। वरूण ने जो चाहा था वो उन्हें मिल गया....राजनीति के गलियारों में गांधी-नेहरू परिवार का ये गुमनाम चेहरा अपने भड़काउ भाषण से अचानक चर्चा मे आया.... और लोगों के जेहन में छा गया। इस से पहले साहित्य में रूचि रखनेवाले चंद लोग ही वरूण को जानते थे....लेकिन हिन्दुओं का स्वयंघोषित मसिहा बनकर वरूण ने अपनी पहचान बनाने के लिए लोगों के बीच एक ऐसी चाल चली जो आज के राजनीत के लिए सब से उपयुक्त और अचूक हथियार माना जाता है....उन्होंने इसके लिए लोगों के इमोषन का जमकर इस्तेमाल किया। वरूण राम के रथ पर सवार होकर हिन्दुत्व के रास्ते राजनीति के जिस मुकाम तक पहुंचना चाहते थे....उसमें वह बहुत हद तक सफलता भी पाई....अब देखना होगा के राजनीति में अपनी पहचान बनाने के बाद भगवा वस्त्र धारण करनेवाले वरूण राम को कब तक याद रख पाते हैं....

रविवार, मई 03, 2009

चुनावी नेता

चुनाव की मेला में


भाषणों की बेला में


कई दिग्गजों की जुबान फिसल गये


हाथ कटा, रॉलर चले


खूब बोले बाहुबली


क्रुर बने मॉडल नेता


नेताजी बनाये गये नक्सली


अपने क्षेत्रों का ये विज्ञ


मानवता से अनिभिज्ञ


आदर्शवाद के नाम पर


विवेकहीनता दिखा गये


लोकतंत्र के लिए मरने वाले क्रांतिकारी


जब देखते होंगे मारामारी


कहते होंगे क्या कर रहा है


वोटों का ये भिखारी


और फिर सोचते होंगे


कहां हम दुस्सासनों के हाथ में


द्रौपदी का चीर देकर आ गये।।

रविवार, अप्रैल 26, 2009

राबड़ी का गुस्सा

आजकल राबड़ी देवी बहुत गुस्से में रहती है....खासकर मीडियावालों से विशेष नाराज रहती है...उनकी माने तो बिहार सरकार को मीडिया ही चला रही है.....वह कभी इतना गुस्सा जाती है कि पत्रकारों से कहती है आपलोग नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बना दो...मीडियावाले उनकी व्यथा को अच्छी तरह समझ सकते हैं.....एक तो चिलचिलाती धूप की तपिश....उपर से चुनावी गर्मी...घुमते घुमते किसी का भी मन खिज सकता है....खासकर वे लोग जिन्हें हमेशा एयरकंडिशनर में रहने की आदत है....उनको गुस्सा आना स्वभाविक है.....अपने ठेठ अंदाज के लिए चर्चित राबड़ी चुनावी रैलियों में जमकर भड़ास निकाल रही हैं.....विशेषकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जद यू नेता ललन सिंह उनके निशाने पर हैं.....नीतीश और ललन सिंह को एक दूसरे का साला बताने पर उठे विवाद के बाद राबड़ी को जब चुनाव आयोग ने राहत दी.....उसके बाद वह एक नये अंदाज में सामने आई....उन्हें जब भी मौका मिलता है...नीतीश और ललन सिंह केा नहीं छोड़ती....एक दिन उन्होंने नीतीश कुमार की तुलना किचड़ से कर डाली....फिर भी नहीं रूकी और अपने मुख्यमंत्री को नीच तक कह डाला......ये तो कुछ भी नहीं था....जब बारी ललन सिंह की आई तो पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वह नक्सलवादी हैं....खैर नेताओं का अंदाज-ए -बयां कुछ खास होता है......नक्सली और बाहुवलियों के पत्नियों को टिकट देकर नेता बनाते हैं....और नेतााओं को नक्सली बताते हैं.....इसे ही नेतागिरी कहते हैं.....राबड़ी देवी भी अब नेता बन चुकी है......चुनाव अभी जारी है....और राबड़ी का अपना गंवई अंदाज में भाषण भी....कोई आश्चर्य नहीं होगा..जब राबड़ी जी किसी चुनवी मंच से रांड़ी, बेटखौकी कर रही होगी.......

शनिवार, अप्रैल 25, 2009

सब के दुश्मन भाजपाई....

अपने मजकिया अंदाज से लोगों के दिलांे पर राज करनेवाले लालू प्रसाद यादव कुछ बदले बदले से नज़र आ रहे हैं.....1990 के बाद बिहार में पहला ऐसा चुनाव हो रहा है जब राज्य में उनकी सरकार नहीं है...इसका असर साफ तौर पर राजद सुप्रीमो के हावभाव पर देखा जा सकता है....हमेशा आत्मविश्वास से भरे रहनेवाले लालू इस बार हताश है...परेशान हैं...और बहुत हद तक निराशाओं की झलक, उनके भाषणों में दिखती है...कभी कभी तो ऐसा लगता है कि लालू सठिया गये हैं...वोटों के जुगाड़ में वह वे बाते भी कह जाते हैं...जो उनके लिए सिरदर्द बन जाती है...कभी वह वरूण गांधी पर रोलर चलाने की बात कहते हैं....तो कभी कहते हैं कि भागलपुर दंगे में आडवाणी का हाथ है.... माय समीकरण बनाकर बिहार की सत्ता पर काबिज होने बाले लालू स्लोगन बनाने में भी माहीर है....बहुत दिन पहले वह भूरा बाल साफ करो का नारा बुलंद किया....फिर समाज के चार जातियों के बारे में कहा था कि ये चारो चुड़ा, दही, चिनी और मिर्च है, इसे लपेट कर खा लो....खैर ये तो पुरानी बातें हो गई...इस बार उनके निशाने पर भाजपाई हैं...और उन्होंने भाजपाइयों के लिए कहा है कि, हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई...सब के दुश्मन भाजपाई.... वैसे उनके निशाने पर सिर्फ भाजपाई या एनडीए नहीं है....वह तो उस पार्टी पर भी बरस पड़ते हैं...जिसके सरकार में वह मंत्री हैं....एक तो चिलचिलाती धूप की गर्मी...साथ में चुनाव की गरमाहट अलग से.....बैसाख के कंठ सुखानेवाली गर्मी में चलते चलते लालू जी कभी कभी तो इतना गरमा जाते हैं कि पहुंचते हैं चुनाव में वोट जुटाने के लिए....और गुस्से में अपने विधायक को पार्टी से निकाल देते हैं...... अब तो दो जून को ही पता चलेगा... कि लालू के गरम हुए मिजाज पर सूबे की जनता ठंढ़ पानी छिड़कती है....या गरम पानी..

सोमवार, मार्च 16, 2009

प्यार की हार

चांद मोहम्मद और फ़िज़ा की कहानी एक ऐसी मोहब्बत की दास्तां हैं, जो जज्बात और जुनून में अंधे होकर जल्दीबाजी में लिया गया फ़ैसला बनकर सामने आया है। उनकी करतूत प्यार के नाम पर न मिटनेवाला काला धब्बा बन गया। जो लोग चंद महिनो पहले इन दोनों के बारे में क़ासिदे गढ़ते थे आज वह बेतुका दलिलें देने पर मजबूर है। अपने अपने व्यवहारिक जीवन में महत्वपूर्ण जिम्मेवारियों का निर्वहन करते वक्त इन दोनो ने इश्क की नदानी में एक ऐसा गाथा गढ़ गया जो प्रेम विरोधी ताकतों के लिए व्रहृास्त्र बन गया। इन दोनो की प्रेम कथा एक ऐसे मोड़ पर जा पहुंची है जहां पर नफरत, काली कोठरी में अंधरों की तरह चारो तरफ फैली हुई है। यह किसी को उम्मिद नहीं था कि जो समाज की रूढ़िवादी विचारधारा को तोड़ दुस्साहसिक कार्य करने का हिम्मत दिखाया, वह धैर्यता की परीक्षा में इतनी जल्दी हार मान जऐगा।
इन दोनों ने मीरा और कन्हैया की प्रेम को नये रूप में सामने लाया। कानूनी दांव पेंच से बचने के लिए अपना धर्म भी बदला। घर भी छोड़ दिया। सारे रिश्ते नाते तोड़ लिया। पिता की संपत्ति से भी हाथ धो लिया। उपमुख्यमंत्री की कुर्सी भी गंवा दिया। पर अफसोस कि चंद महिनो के बाद इनका इमान भी बदल गया। इन दोनो के बीच तक़रार इस कदर घर कर गया कि बात तालाक तक जा पहुंची। चांद मोहम्मद लंदन में है, जबकि फ़िजा भारत में। चांद ने फ़िज़ा को टेलिफॉन से तलाक़ दे दिया है। परन्तु जिस धर्म में परिवर्तित होकर इन्होंने शादी की है, वह धर्म टेलिफोन के ज़रिये तलाक की इजाज़त नहीं देता है। वैसे कुछ बुद्धिजीवियों का तो यहां तक कहना है कि जिस तरह से इन दोनो ने धर्म बदला था और जिस मक़सद के लिया बदला था, वह जायज़ नहीं था। जो भी हो। पर ये दोनो प्यार के जिस धर्म के लिए अपनी कहानी बनाई उसको बदनाम कर दिया।
फिलहाल ये दोनो प्रेम पथ से विचलित होकर नफरत की उस अंधेरी खाई की तरफ अपना कदम बढ़ा दिये हैं जहां एक शराब पी कर ज़िंदगी काट रहा है तो दूसरा नींद की गोली खा कार ज़िंदगी को सदा के लिए काटना चाह रहा है। ऐसी विषम परिस्थिति बनने के लिए इन दोनो में गलती किसकी है, यह तो वे ही बेहतर जानते होंगे। गलती जिसकी भी हो। पर हार तो प्यार की ही हुई है। और शायद प्यार करने वाले दोनो को कभी माफ़ नहीं करेंगे।

रविवार, मार्च 15, 2009

बैक फ़ुट पर आडवाणी

पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव के लिए सभी पार्टियां पुरजोर प्रचार कर रही है। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी भी चुनाव को लेकर काफी उत्सुक है। उसकी उत्सुकता का आलम है कि उसने अपने पार्टी के तरफ से प्रधानमंत्री के नाम का घोषणा कर चुकी है। लालकृष्ण आडवाणी भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने को बेताव हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में इंडिया शइनिंग के नारो के साथ चुनावी मैदान में उतरी भाजपा औंधे मुंह गिर गई थी। यह बात पी एम इन वेटिंग आडवाणी जी भी स्वीकार कर चुके हैं। अपनी पिछली गलतियों से सीख लेकर भाजपा आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी दिलाने के लिये तैयार है। परन्तु कुछ कारण ऐसे है जिससे स्पष्ट होता है कि आडवाणी का प्रधानमंत्री बनना नामुमकिन तो नहीं पर मुश्किल अवश्य है। यदि हम पिछले लोकसभा चुनाव से तुलना करें तो ऐसा लगता है कि शायद ही आडवाणी जी का सपना पुरा हो पाये। इसके कुछ बाजिव कारण हम आपके सामने रख रहे है।
सब से पहली बात भाजपा के पास वोट मांगने योग्य चुनावी मुद्दों का अभाव है। फिलहाल उसके पास कोइ भी ऐसा मुद्दा नहीं है जिससे वह वर्तमान सरकार को पटखनी दे सके। इसका उदाहरण है कि करीब दस साल बाद फिर से उसे राम मंदिर याद आया है। ऐसा कहा जाता है कि जब भाजपा के पास कोई मुद्दा नहीं होता है तो वह राम के सहारे चुनाव लड़ता है। खैर, जनता सब कुछ भलीभांति जानती है। वैसे देश में या कहे दुनिया भर में आर्थिक मंदी और आतंकवाद का मुद्दा चरम पर है, पर इसे चुनावी मुद्दा बनाने से भाजपा को कोई फायदा नहीं होगा। इसका उदाहरण वह पिछले संविधान सभा चुनाव में देख चुकी है। अब लोग स्थानीय विकास पर वोट देतें है। और भाजपा के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं है।
दूसरी बात पार्टी में जीताउ नेताओं की कमी हो गई है। अटल बिहारी वाजपेयी खराब स्वास्थ्य के कारण सकृय राजनीति से अलग हैं। जनता अटल के नाम पर भी भाजपा को वोट देती थी। जो इस बार शायद नहीं मिले। इसके अलावा प्रमोद महाजन और साहिब सिंह वर्मा भी अब नहीं रहे। जिनका आम जनता पर मजबूत पकड़ था। ऐसे ही मध्यप्रदेश में उमा भारती और उत्तरप्रदेश में कल्याण सिंह की कमी भाजपा को जरूर खलेगी।
तीसरी बात भाजपा के पास युवा नेता का अभाव है। यहां युवा कहने का मतलब अंडर 40 है। जिस समय देश में एक बहुत बड़ा हिस्सा युवा वोटरों का है, उसमें पार्टी के पास जनता पर पकड़ वाली युवा नेता का न होना या कम होना चिंता का विषय है। जबकि कांग्रेस के पास एक बड़ी तादात में युवा नेता हैं। जो जनता का प्रतिनिधि कर रहे हैं। खासकर राहुल गांधी इसी का फायदा उठाना चाह रहे हैं।
चौथी और सब से अहम बात कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में गठबंधन की राजनीति महत्वपूर्ण हो गई है। क्षेत्रीय पार्टियों के सहयोग के बिना केन्द्र में सरकार बनाना असंभव हो गया है। ऐसे में भाजपा पिछड़ती दिखाई पड़ती है। भाजपा के पुराने सहयोगी में अधिकांश अभी असहयोग कर रही है। पांच साल पहले भाजपा के साथ चौबीस पार्टियां थी, जो फिलहाल सिमटकर छह रह गई है। यहां तक कि बिजु जनता दल चुनाव से ऐन वक्त पहले अलग हो गई। जबकि तृणमुल कांग्रेस तो वाकायदा यूपीए में शामिल हो गई है।
इसके अलावा पार्टी में अंत:कलह भी है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं। एक समय तो उन्होंने पार्टी की राजामंदी के बिना लोकसभा चुनाव लड़ने को तैयार हो गये थे। किसी तरह उन्हें शांत किया गया। ऐसे ही शत्रुघ्न सिन्हा ने भी टिकट को लेकर काफी घमासान मचाया। जब कल्याण सिंह अंदुरूनी कलह के चलते पार्टी छोड़ कर चले गये तब आनन फानन में सिन्हा को टिकट देने की बात कह कर शांत किया गया। अभी भी कई ऐसे नेता हैं जो टिकट के नाम पर पार्टी से बगावत कर सकते हैं। ये तमाम बातें ऐसी है जो आडवाणी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में हरसभंव अवरोध उत्पन्न करेगी। इसके बाद भी भाजपा को उम्मीद है कि देश का अगला प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ही होंगे। अब तो यह चुनाव के बाद ही सामने आयेगा कि आखिर जनता क्या चाहती है।

शनिवार, मार्च 14, 2009

लोक नोट तंत्र

खादी का कुर्ता और धोती पहने
कुछ शख्स को गांव में देख
लोगों ने सोचा
शायद चुनाव का समय आ गया है,

उन्हें देखने के लिए भीड़ बढ़ने लगी
नेताजी के होठों पर मुस्कान उभरने लगी
पर शायद लोग कर रहे थे
इसी दिन का इंतजार
करने लगे गुस्सों का इजहार
लगा दिया प्रश्नों का बौछार
पूछा- पांच साल बाद क्या करने आये हो ?
क्या हमें फिर से बेवकुफ बनाने आये हो ?
हम तुम्हें नहीं जानते
तुम्हारी पार्टी को नहीं पहचानते
लोगों के सब्र का बांध टुटने लगा
धीरे धीरे माहौल बिगड़ने लगा
और नेताजी मुर्दावाद का हल्ला होने लगा

उधर नेताजी का पी ए लोगों को समझाने लगा
उन्हें बहलाने, फुसलाने लगा
फिर बोला
नेताजी को अपनी गलती का अहसास हो गया है
वह पश्चाताप करने आये हैं
तुम सब के लिये खास तोहफा लाये हैं
गांव में बिजली लगेगी, स्कूल बनेगा
सड़क भी बनेगी, सामूदायिक घर भी बनेगा
इस बार हम सिर्फ वादा नहीं करते हैं
साथ में प्रमाण भी लाये हैं
एक एक कर आओ
अपना हिस्सा लो
और नेताजी को आखिरी मौंका दो
और उन्हें भारी मतो से जीताओ,

लोग पुरानी बातों को भूलने लगे
अपना हिस्सा पहले लेने के लिये
आपस में ही लड़ने लगे
और फिर हाथों में रूपयों का नोट लेकर
नेताजी जिंदाबाद का नारा लगाने लगे ।।