आखिरकार उस नाटक का पटाक्षेप हो ही गया....जो प्रायोजित रूप से चुनाव के लिए खेला गया था। इस नाटक में एक अनजान चेहरे को नायक के रूप में सामने लाया गया,,,और और नाटक का अंत होते-होते लोगों ने उसे हिरो बना दिया। चुनाव खतम होने के चार दिन बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने वरूण गांधी के उपर से एन एस ए हटा लिया। वरूण ने जो चाहा था वो उन्हें मिल गया....राजनीति के गलियारों में गांधी-नेहरू परिवार का ये गुमनाम चेहरा अपने भड़काउ भाषण से अचानक चर्चा मे आया.... और लोगों के जेहन में छा गया। इस से पहले साहित्य में रूचि रखनेवाले चंद लोग ही वरूण को जानते थे....लेकिन हिन्दुओं का स्वयंघोषित मसिहा बनकर वरूण ने अपनी पहचान बनाने के लिए लोगों के बीच एक ऐसी चाल चली जो आज के राजनीत के लिए सब से उपयुक्त और अचूक हथियार माना जाता है....उन्होंने इसके लिए लोगों के इमोषन का जमकर इस्तेमाल किया। वरूण राम के रथ पर सवार होकर हिन्दुत्व के रास्ते राजनीति के जिस मुकाम तक पहुंचना चाहते थे....उसमें वह बहुत हद तक सफलता भी पाई....अब देखना होगा के राजनीति में अपनी पहचान बनाने के बाद भगवा वस्त्र धारण करनेवाले वरूण राम को कब तक याद रख पाते हैं....
गुरुवार, मई 14, 2009
वरुण एन एस ऐ से मुक्त
रविवार, मई 03, 2009
चुनावी नेता
चुनाव की मेला में
भाषणों की बेला में
कई दिग्गजों की जुबान फिसल गये
हाथ कटा, रॉलर चले
खूब बोले बाहुबली
क्रुर बने मॉडल नेता
नेताजी बनाये गये नक्सली
अपने क्षेत्रों का ये विज्ञ
मानवता से अनिभिज्ञ
आदर्शवाद के नाम पर
विवेकहीनता दिखा गये
लोकतंत्र के लिए मरने वाले क्रांतिकारी
जब देखते होंगे मारामारी
कहते होंगे क्या कर रहा है
वोटों का ये भिखारी
और फिर सोचते होंगे
कहां हम दुस्सासनों के हाथ में
द्रौपदी का चीर देकर आ गये।।
रविवार, अप्रैल 26, 2009
राबड़ी का गुस्सा
आजकल राबड़ी देवी बहुत गुस्से में रहती है....खासकर मीडियावालों से विशेष नाराज रहती है...उनकी माने तो बिहार सरकार को मीडिया ही चला रही है.....वह कभी इतना गुस्सा जाती है कि पत्रकारों से कहती है आपलोग नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बना दो...मीडियावाले उनकी व्यथा को अच्छी तरह समझ सकते हैं.....एक तो चिलचिलाती धूप की तपिश....उपर से चुनावी गर्मी...घुमते घुमते किसी का भी मन खिज सकता है....खासकर वे लोग जिन्हें हमेशा एयरकंडिशनर में रहने की आदत है....उनको गुस्सा आना स्वभाविक है.....अपने ठेठ अंदाज के लिए चर्चित राबड़ी चुनावी रैलियों में जमकर भड़ास निकाल रही हैं.....विशेषकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जद यू नेता ललन सिंह उनके निशाने पर हैं.....नीतीश और ललन सिंह को एक दूसरे का साला बताने पर उठे विवाद के बाद राबड़ी को जब चुनाव आयोग ने राहत दी.....उसके बाद वह एक नये अंदाज में सामने आई....उन्हें जब भी मौका मिलता है...नीतीश और ललन सिंह केा नहीं छोड़ती....एक दिन उन्होंने नीतीश कुमार की तुलना किचड़ से कर डाली....फिर भी नहीं रूकी और अपने मुख्यमंत्री को नीच तक कह डाला......ये तो कुछ भी नहीं था....जब बारी ललन सिंह की आई तो पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वह नक्सलवादी हैं....खैर नेताओं का अंदाज-ए -बयां कुछ खास होता है......नक्सली और बाहुवलियों के पत्नियों को टिकट देकर नेता बनाते हैं....और नेतााओं को नक्सली बताते हैं.....इसे ही नेतागिरी कहते हैं.....राबड़ी देवी भी अब नेता बन चुकी है......चुनाव अभी जारी है....और राबड़ी का अपना गंवई अंदाज में भाषण भी....कोई आश्चर्य नहीं होगा..जब राबड़ी जी किसी चुनवी मंच से रांड़ी, बेटखौकी कर रही होगी.......
शनिवार, अप्रैल 25, 2009
सब के दुश्मन भाजपाई....
अपने मजकिया अंदाज से लोगों के दिलांे पर राज करनेवाले लालू प्रसाद यादव कुछ बदले बदले से नज़र आ रहे हैं.....1990 के बाद बिहार में पहला ऐसा चुनाव हो रहा है जब राज्य में उनकी सरकार नहीं है...इसका असर साफ तौर पर राजद सुप्रीमो के हावभाव पर देखा जा सकता है....हमेशा आत्मविश्वास से भरे रहनेवाले लालू इस बार हताश है...परेशान हैं...और बहुत हद तक निराशाओं की झलक, उनके भाषणों में दिखती है...कभी कभी तो ऐसा लगता है कि लालू सठिया गये हैं...वोटों के जुगाड़ में वह वे बाते भी कह जाते हैं...जो उनके लिए सिरदर्द बन जाती है...कभी वह वरूण गांधी पर रोलर चलाने की बात कहते हैं....तो कभी कहते हैं कि भागलपुर दंगे में आडवाणी का हाथ है.... माय समीकरण बनाकर बिहार की सत्ता पर काबिज होने बाले लालू स्लोगन बनाने में भी माहीर है....बहुत दिन पहले वह भूरा बाल साफ करो का नारा बुलंद किया....फिर समाज के चार जातियों के बारे में कहा था कि ये चारो चुड़ा, दही, चिनी और मिर्च है, इसे लपेट कर खा लो....खैर ये तो पुरानी बातें हो गई...इस बार उनके निशाने पर भाजपाई हैं...और उन्होंने भाजपाइयों के लिए कहा है कि, हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई...सब के दुश्मन भाजपाई.... वैसे उनके निशाने पर सिर्फ भाजपाई या एनडीए नहीं है....वह तो उस पार्टी पर भी बरस पड़ते हैं...जिसके सरकार में वह मंत्री हैं....एक तो चिलचिलाती धूप की गर्मी...साथ में चुनाव की गरमाहट अलग से.....बैसाख के कंठ सुखानेवाली गर्मी में चलते चलते लालू जी कभी कभी तो इतना गरमा जाते हैं कि पहुंचते हैं चुनाव में वोट जुटाने के लिए....और गुस्से में अपने विधायक को पार्टी से निकाल देते हैं...... अब तो दो जून को ही पता चलेगा... कि लालू के गरम हुए मिजाज पर सूबे की जनता ठंढ़ पानी छिड़कती है....या गरम पानी..
सोमवार, मार्च 16, 2009
प्यार की हार
रविवार, मार्च 15, 2009
बैक फ़ुट पर आडवाणी
शनिवार, मार्च 14, 2009
लोक नोट तंत्र
कुछ शख्स को गांव में देख
लोगों ने सोचा
शायद चुनाव का समय आ गया है,
उन्हें देखने के लिए भीड़ बढ़ने लगी
नेताजी के होठों पर मुस्कान उभरने लगी
पर शायद लोग कर रहे थे
इसी दिन का इंतजार
करने लगे गुस्सों का इजहार
लगा दिया प्रश्नों का बौछार
पूछा- पांच साल बाद क्या करने आये हो ?
क्या हमें फिर से बेवकुफ बनाने आये हो ?
हम तुम्हें नहीं जानते
तुम्हारी पार्टी को नहीं पहचानते
लोगों के सब्र का बांध टुटने लगा
धीरे धीरे माहौल बिगड़ने लगा
और नेताजी मुर्दावाद का हल्ला होने लगा
उधर नेताजी का पी ए लोगों को समझाने लगा
उन्हें बहलाने, फुसलाने लगा
फिर बोला
नेताजी को अपनी गलती का अहसास हो गया है
वह पश्चाताप करने आये हैं
तुम सब के लिये खास तोहफा लाये हैं
गांव में बिजली लगेगी, स्कूल बनेगा
सड़क भी बनेगी, सामूदायिक घर भी बनेगा
इस बार हम सिर्फ वादा नहीं करते हैं
साथ में प्रमाण भी लाये हैं
एक एक कर आओ
अपना हिस्सा लो
और नेताजी को आखिरी मौंका दो
और उन्हें भारी मतो से जीताओ,
लोग पुरानी बातों को भूलने लगे
अपना हिस्सा पहले लेने के लिये
आपस में ही लड़ने लगे
और फिर हाथों में रूपयों का नोट लेकर
नेताजी जिंदाबाद का नारा लगाने लगे ।।