रविवार, जनवरी 11, 2009

पंचायती फैसलों की हकीकत .....

एक लड़की के साथ बलात्कार करने की सजा -कान पकड़कर दस बार उठक -बैठक। यह एक पंचायत का फैसला है। यह फैसला द्वापर या सतयुग में नही किया गया है। बल्कि आज के युग में यह फैसला हुआ है। यानी की २१ वीं शताब्दी के महान भारत का फैसला है। घटना राजधानी से सटे नॉएडा की है। जहाँ एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया जाता है। बलात्कार के आरोप में दस लड़कों को अभियुक्त बनाया जाता है। परन्तु यह बात उस गाँव वाले को हज़म नही होता है जहाँ का वह आरोपी रहने वाला है। आनन् फानन में गाँव में एक पंचायत बुलाई जाती है। और सभी आरोपियों को मासूम करार दिया जाता है। साथ ही आरोपियों को अनजान बालक बताते हुए सारी गलती पीड़ित लड़की के माथे पर मढ़ दिया जाता है। कहा जाता है कि लड़की अपने बॉयफ्रेंड के साथ ग़लत अवस्था में थी। ऐसे ही एक दूसरी घटना में हरियाणा के गाँव में एक लड़की की अस्मत लूटी जाती है। बात आगे बढ़ने पर गाँव में पंचायत बुलाई जाती है। और पंचायत में फैसला किया जाता है कि पीड़ित लड़की को मुआवजे के तौर पर आरोपी २१ हज़ार रुपया देगा। किसी पंचायत का यह अकेला फैसला नही है। पंचायतों में इस तरह के फैसले आमतौर पर देखा जाता है। खासकर महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर। इस तरह फैसला करने में हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्य सब से आगे है। पंचायत के इस पक्षपातपूर्ण और विवेकहीन फैसलों पर मंथन करने से पहले पंचायत की बनावट और उसके महत्व को समझने के लिए इतिहास के पन्नो को थोड़ा पलटते है। दरअसल पंचायत भारतीय ग्राम्य जीवन का पहला और महत्वपूर्ण अदालत होता है। जिसका मुख्य कार्य समाज में घटे विभिन्न घटनाओं का आपस में बैठकर निष्पक्ष रूप से निपटारा करना होता है। shaaब्दीक रूप से पंचायत का मतलव ऐसे समूह से है जिसमे पाँच प्रतिनिधि होता है। यथा -ब्रह्मण, क्षत्रिय, वस्य, सुदर और परमेश्वर। यानी कि समाज के पांचो अंगों का एक- एक प्रतिनिधि। और इन पञ्च परमेश्वर का काम सामाजिक तथा मानवीय हीत को ध्यान में रखकर फैसला करना होता है। इन पंचों के हाथ में ग्रामीण सभ्यता, संस्क्रीती को बचाने का ज़िम्मा भी रहता है। हमारा देश गावों का देश है। इसलीय यहाँ पंचायती अवधारना बहुत पुराणी है। वैदिक काल के आरम्भ से ही पंचायतो कि महक मिलाती है। उस समय गावं का प्रबंध ग्रामीनी करता था और उस के न्रेतित्व में गावं से जुड़ी सभी निर्णय किए जाते थे। उत्तर वैदिक काल में भी रामायण और महाभारत में पंचायतों की अवधारना स्पष्ट होती है। बौधकाल में भी गावं का बुजुर्ग आपस में बैठकर सामाजिक न्याय का फैसला करते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी उल्लेख है कि स्थानीय विवादों का निर्णय ग्राम व्रीधों एवं सामंतों द्वारा किया जाता था। इस के बाद मुगलकाल और अँगरेज़ के ज़माने में भी ऐसा ही देखने को मिलता है कि गावं के ज़मींदार और बुजुर्ग पंchaयाती फैसला करते थे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद इसके लिए कानून बना। और फिर जनता के द्वारा सरपंच का चुनाव होने लगा। जो स्थानीय विवादों को निपटाने में सहयोग करता है।

पंचायत के इस थोड़ी सी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को देखकर ऐसा लगता है कि पंचायती निर्णय का अधिकार हमेशा से दबंगों और बुजुर्गों के हाथ में रहा है। जो मनुवादी सोच में रहकर फैसला करने के आदी है। धीरे-धीरे समय तो बदला, पर ग्रामीण परिवेश रह रहे लोगों में अभी भी पुरातनवादी सोच हावी रहा है। आज भी पंचायती फैसले लोग उसी सोच से करते है। गावं में अभी भी अशिक्षा, गरीबी और पुरुषवादी मानसिकता चरम पर है। इसी का नतीजा है कि जिस पंचायतों में लोग न्याय की उम्मीद लेकर जाते हैं, वहीं उनको सरे आम बेईज्ज़त होना पङता है। पंचायतो में किसी को डायन बताकर पिटा जाता है तो किसी की अस्मत को चंद रुपयों में निलाम कर दी जाती है। दरअसल ये घटनाएं बेआबरू करती है समाज की उन सोच और विचारों को जो एक तरफ महिलाओं को समान अधिकार देने की बात करता है और समाज के हर क्षेत्र में उसकी सहभागिता की वकालत करता है , जबकि दूसरी तरफ मौत सी ज़िंदगी जीने पर मजबूर करता है
ऐसे में सवाल उठता है कि इस मामलों के बीच सरकार कहाँ है? और क्या कर रही है? सरकार और प्रशासन इस बर्बरतापूर्ण अत्याचारों को रोकने के लिए क्या पहल कर रही है? मानव अधिकार आयोग और महिला आयोग के करता-धरता कहाँ है? हैसब कुछ हैसभी संगठन भी हैऔर सरकार भी हैसरकार महिलाओं के विकास के काम भी कर रही हैवह २४ जनवरी को बालिका दिवस मना रही हैलेकिन पंचायत के इस फैंसलों पर मौन हैक्या होगा इस बालिका दिवस मनाने से? कौन समझता है इस का मतलब ? कम से कम गावं के चौपाल पर बैठकर पंचायतों के ज़रिये ह्रदयविदारक निर्णय लेने वाले वे लोग तो किसी भी हालत में इस का मतलब नही समझते है जो औरत को पैरों की जूती समझते हैइसलिए यदि सरकार बालिका दिवस मनाने के बदले यदि उनपर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए मजबूत पहल करे तो बेहतर हैसाथ ही तरह के पंचायती फैसला करने वाले पंचों पर भी ज़मीनी तौर पर कर्र्बाई ज़रूरत दिखायी पड़ती है ...........

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