रविवार, दिसंबर 28, 2008
नेता बोले तो .........मौकापरस्त
शनिवार, दिसंबर 27, 2008
पाकिस्तान भारत से युद्ध चाहता है........
पहली बात वंहा के नेताओं ने आक्रामक बयान दिए है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री हरेक दिन मीडिया के सामने बयां देते हैं कि हम माकूल जबाव देने के लिए तैयार हैविदेश मंत्री साहब चेतावनी भरे लहजे में कहतें है कि हम युद्ध के लिए तैयार है। और सब से उत्तेजक बयान तो पूर्व प्रधान मंत्री का भाई और पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के मुख्यमंत्री शाहबाज़ शरीफ का आता है। वह तो साफ तौर पर कहते है कि भारत इस लिए पाकिस्तान पर हमला करने से डर रहा है क्योंकि हमारे पास परमाणु हथियार है।
दूसरी बात बिना किसी सबूत के भारतीय विदेशमंत्री के नाम से फोन कॉल कि झूठी अफवाहें फैलाना। बाद में यह भी साबित हो गया कि पाकिस्तानी हूक्मरानो ने खुद टेलीफोन का नाटक किया था । इस बात को वंहा कि सरकार ने भी स्वीकार किया है। एक झूठी फ़ोन कॉल का हल्ला अचानक युद्ध की संभावनाओं को प्रसस्त कर दिया ।
तीसरी बात एक दिन पाकिस्तानी गृह मंत्रालय से बयान आता है कि तीन भारतीय वायुसेना की विमानों को पाकिस्तान सीमा के भीतर देखा गया है। पाकिस्तानी वायुसेना के प्रवक्ता ने चिल्ला चिल्लाकर अंतर्राष्टीय समुदाय को गुमराह करने की कोशिशें की। जाँच के बाद यह कारनामा भी झूठा साबित हुआ।
चौंथी बात, पाकिस्तानी गृह मंत्रालय के एक अधिकारी का बयान आता है कि लाहोर ब्लास्ट में भारतीयों का हाथ है। इस सिलसिले में एक भारतीय को हिरासत में भी लिया गया। संयोगवश पाकिस्तानी सरकार के मुंह पर उसका अपना ही पालतू कुत्ता ने तमाचा जर दिया। अंसार वा मोहाजिर न का आतंकी sangathan लाहोर धमाके की जिम्मेबारी लेकर दिखा दिया कि पाकिस्तानी सरकार युद्ध के लिए कितना उत्सुक है।
और अंत में पांचवां एवं सब से महत्वपूर्ण बात यह है कि एकाएक भारत से सेट पाकिस्तानी सरकार रेंज़र्स को हटाकर सेना कि गश्ती तेज़ कर दी गयी ।
उपरोक्त तमाम बातो से स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान युद्ध के लिए कितना उत्तेजीत है। पर एक प्रश्न सामने आता है कि पाकिस्तान युद्ध क्यों चाहता है? जब कि वह बहूत अच्छी तरह जनता है कि आतंकवाद के नाम पर होनेवाले इस लडाई में कोई भी देश उसका साथ नही देगा। इसके अलावा पाकिस्तान तुलनात्मक दृष्टिकोण से भारत से हरेक क्षेत्र में पीछे है। भारत के पास करीब तीन सो अरब डॉलर जमा पूंजी है, जब कि पाकिस्तान के पास मात्र तीन अरब डॉलर है। भारत के पास तेरह लाख से अधिक सैनिक है , जब कि पाकिस्तान के पास इस का ठीक आधा है। कमोवेश यही स्थिति लड़ाकू पनडुब्बी , लड़ाकू विमान और अन्य हथियारों के मामले भी है। इतना कुछ जानने के बाद भी पाकिस्तान का मिजाज इतना गर्म क्यों है?
दरअसल पाकिस्तान में लोकतंत्र नाम मात्र का है। वंहा कि सरकार कठपुतली है। जिसे पाकिस्तानी सेना,आई एस आई और आतंक्वासी संगठन अपने इशारों पर नचाती है। मजबूरन सब सच्चाई जानने के बावजूद पाकिस्तानी सरकार आतंकियों को पकरने के वजय उस का साथ दे रही है। यदि वंहा का कोई नेता सच का साथ देने की हिम्मत भी करता है तो उसे चुप करा दिया जाता है। उदाहरण के लिए इस घटना के शुरू में जा पाकिस्तानी राष्ट्रपति आशिफ अली ज़रदारी ने भारत को सहयोग करने का दिलासा देते हुए आई एस आई प्रमुख को भारत भेजने की बात कही थी। उस के बाद उन के ऊपर इतना दवाब बनाया गया कि वे बिना किसी लिहाज़ के तुरत फुरत में अपना बयान बदल दिए । बाद में यही हल नवाज़ शरीफ साहाब का भी हुआ। अब तो सच्चाई उजागर करने वाले न्यूज़ चैनलों पर भी बन लगाने कि बात की जा रही है।
असल में पाकिस्तानी सेना, आई एस आई, और आतंकियों कि सोच है कि युद्ध कि उन्माद फैलाकर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आतंकी घटना से हटाकर युद्ध कि तरफ कर दिया जाए । जिससे उसे मजहब और मजबूरी के नाम पर सहानभूति और सहयोग मिल जाए।
इसलिए अब हम हिन्दुस्तानियों के लिए समय आ गया है कि पाकिस्तानियों कि हरेक करतूतों को ध्यान से देखकर उनकी हरेक मंसूबों पर पानी फेरते हुए ऐसा माकूल जवाब दिया जाए जिस से वे अपने बुने जाल में ख़ुद फँस जाए और फिर हमारी तरफ आँख उठाकर देखने की जुर्रत न करें .......
गुरुवार, दिसंबर 25, 2008
अटलजी के जन्मदिन पर

मंगलवार, दिसंबर 23, 2008
आख़िर कब तक ?
आखिर .....
आगे....
कहते है कि खेल और संगीत प्रेम से बना एक एसा हथौरा है जो हर द्वेष और मजहब कि दीवारों को तोर देती है। हम ने हमेशा इस हथौरे उपयुक्त समय में प्रयोग किया। इस के बावजूद हमें क्या मिला ? परिवार में मातम और सिर्फ मातम। आख़िर का तक हम इस हथौरे का प्रयोग ऐसे ह्रदय विहीन लोगों के लिए करते रहेंगे जो इस का मतलब नही समझते हैं।
यह कोई कैसे सोच सकता है कि जिस परिवार का एक सदस्य हमारे भाई का कत्ल करेगा हम उस परिवार को स्वीकारेंगे ? पनाह देंगे। प्यार देंगे। अब ये सब नाटक बहूत हो चुका है। हम नही कहते कि उस परिवार का हरेक सदस्य कातिल है। निर्दयी है। डरपोक है। पर उस परिवार के किसी सदस्य को स्वीकारना भी अब सहनशीलता से परे है। कहते है कि सहनशीलता जब हद से ज्यादा हो जाती है तो वो बुजदिली में बदल जाती है। और हमारा परिवार ऐसा नहीं है। हम एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते है जो जिस तरह प्यार में जान देना जनता है उसी तरह धोखा मिलने पर उस को बर्बाद करना भी बेहतर जनता है ........
रविवार, दिसंबर 21, 2008
नेता जी पर गुस्सा क्यों आता है ........
अब प्रश्न उठता है कि देश के एक जिम्मेबार और पथ प्रदर्शक व्यक्ति के प्रति लोगो में नकारात्मक सोच क्यों है? दरअसल एकाएक ऐसा नही हुआ है। बल्कि पिछले कुछ सालों में नेताओं के स्वभाव , हावभाव, विचार और कार्य करने के तरीकों में नाटकीय ढंग से हुए परिवर्तन का ये दुष्परिणाम है। इसके लिए नेता स्वयं जिम्मेबार है। उन्होंने नेता शब्द की परिभाषा को बदल दिया है। वे राजनीति को व्यवसाय मात्र समझाने लगे है। वे चुनाव को एक व्यबसयिक परीक्षा की तरह इस्तेमाल करते है। चूंकि परीक्षा में अब भीड़ बढ़ गयी है। भीड़ से आगे निकलने और सुर्खियों में बने रहने के लिए मजबूरन नेताजी उजूल फिजूल बयान देते रहते है। उनको इस बात से कोई लेना देना नही है कि इस का असर कितना घातक हो सकता है। यह किसी से छुपा नही है की राज ठाकरे चुनावी परीक्षा में फेल होने पर बयानवाजी के बूते महाराष्ट्र में ऐसी आग लगाई की वहां का मिजाज़ ही बदल गया। गैर जिम्मेबार पूर्ण बयानवाजी करने पर किसी तरह की सजा नही मिलने के कारण इनका हौसला और ज्यादा बढ़ गया । यही कारण है कि एक केन्द्रिये मंत्री बंगलादेशी घुसपैठी को नागरिकता देने की बात करता है तो दूसरा आतंकी कार्यों में लिप्त संगठन सिमी कि ऊपर प्रतिबन्ध हटाने की वकालत कर रहा है। हद तो तब हो जाती है जब अमर सिंह और अंतुले साहब एक शहीद के शहादत के ऊपरसवाल उठा देते है। इसी तरह एक समय तो एसा लगा कि केरल के मुख्यमंत्री जी सठिया गए है। मुख्यमंत्री जी ने तो एक शहीद के परिवार को गाली तक देने से परहेज नही किए। वास्तविकता यह है कि ये लोग चुनावी परीक्षा में पास होने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते है। और चुनाव जितने के बाद उअनाका एक ही लक्ष्य रहता है , अधिक से अधिक पैसा कमाना। और जब बात पैसे के इर्दगिर्द घूमने लगाती है तो इस तरह का सारा खेल होता होता हैदेश के इन कर्णधारों के लिए यदि एसा कहें तो अतिशयोक्ति नही होगा कि
जो सत्यवादी थे वे शहीद हो गए ,
जो बच गए वे देश के उम्मीद बन गए,
आज टिका है उन्ही पर देश का भविष्य ,
जो कत्ल कर के संसद का सदस्य बन गए॥
ऐसे में एक बात सामने आती है कि आम लोग क्या करे? जो सब कुछ देखने औ सहने के लिए मजबूर है। मुंबई में हुए आतंकी हमले के बाद नेताओं के प्रति लोगों में व्याप्त गुस्सा अचानक बाहर निकल गया । मीडिया के सामने आकर गुस्से का इज़हार किया। लामबंद हो कर कुछ देर के लिए सड़क पर उतरे और अपना भड़ास निकल लिए। इससे अधिक कर भी क्या सकते है। लोग बिवस है। क्योंकि विकल्पहीन है। उन्हें किसी न किसी को नेता बनाना है। लोकतांत्रिक ढांचा ऐसा है जिस में नेता चाहिए । और उस नेता को आम जनता ही चुनेगे। ज्यादा से ज्यादा हम आम लोग एसा कर सकते है की एक को बदलकर दूसरे को खड़ा कर सकते है। पर रहेगा वो भी नेता ही। सिर्फ शरीर बदलता है। शरीर बदलने से कृत्य नही बदलता है। इस लिए उन से थोड़ा बहूत परिवर्तन की उम्मीद तो कर सकते है, पर जरूरी नही है की वह परिवर्तन सकारात्मक ही हो। नेता कोई विशेष व्यक्ति नही होता। बल्कि यह विशेष नाम है उस ज़मात का, जिस का एक अलग धर्म है। अलग ईमान है। और अलग पहचान होता है।
आज भले ही हम इस के विरुद्ध बोल रहे हैं। गरिया रहे है। पर यथार्थ यह भी है की इस ज़मात को विवेकहीनता और भ्रष्टता की हद तक पहुचाने में मेरा ,आपका ओर हमसब का थोरा थोरा योगदान अवश्य है। क्योंकि जाने अनजाने में जो व्यक्ति अपने जमात से थोरा सा हटकर काम करने की कोशिशे भी करता है तो उसे लोग सहजतापूर्वक स्वीकार करने में आनाकानी करने लगता है। उस समय लोगो के मन में परिवारवाद ,जातिवाद , क्षेत्रवाद और पार्टीवाद जैसे कुछ घातक किटानू पनपने लगता है जो तत्काल पथ विचलित कर देता है । और इसी का परिणाम दूरगामी और घातक होता है। फलस्वरूप बाद में हम सब पछताते है। जो आज हमारे सामने है।