शनिवार, दिसंबर 10, 2011

क्रिकेट के ज़रिए नई उम्मीद

इंदौर में जब इतिहास बन रहा था, होलकर स्टेडियम में 22 गज के पिच पर 38 इंच का बल्ला लेकर जब वीरेन्द्र सहवाग गेंद को बॉड्री से बाहर पहुंचा रहे थे, उस वक्त क्रिकेट का रोमांच चरम पर था। भाषावाद, क्षेत्रवाद, देशवाद की तमाम सीमाएं टूट रही थी। महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक और दिल्ली से लेकर तमिलनाडु तक हर कोई सहवाग की कारिस्तानी को जेहन में कैद कर रहा था। दुनियाभर के क्रिकेटप्रेमी टेलीविजन से चिपक गये थे। इंग्लैंड से केविन पिटरसन और ऑस्ट्रेलिया में बैठकर न्यूजीलैंड के खिलाड़ी डेनियल विटोरी मैच का लुत्फ उठा रहे थे। ट्विटर पर शुभकामना दे रहे थे। क्रिकेट प्रेमियों को ये क्षण ना चूकने के लिए कह रहे थे। सहवाग का सबसे तेज़ दोहरा शतक लगते ही दुनियाभर से शुभकामनाएं आने लगी। पाकिस्तान से लेकर ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में भी सहवाग की चर्चा होने लगी। पाकिस्तान के क्रिकेटरों को सहवाग पर ही भरोसा था। यानी एक वक़्त ऐसा लगा मानो दुनिया एक हो गई हो। हर कोई भारतीय क्रिकेट के कायल हो गये थे। सहवाग को शाबासी दे रहे थे। तो इस सब के बीच जेहन में एक सवाल उठने लगा कि क्या अब क्रिकेट के आसरे दुनिया में शांति और सदभाव का भविष्य देखा जा सकता है। क्या क्रिकेट, दुनिया को उस रास्ते पर ले जा सकता है, जहां परमाणु हमले की धमकी की बजाय दूसरे देशों के लोगों को शाबासी और पीठ थपथपाते नज़र आये। ये बात तब और मज़बूती के साथ उभरती है, जब मुम्बई हमले के बाद पहली बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भारत पहुंचते हैं, और फिर मनमोहन सिंह के साथ बैठकर पूरा मैच देखते हैं।
अगर आप इन बातों से इत्तफाक नहीं रखते तो याद कीजिए कोई मसला, वो कोई मुद्दा, वो कोई बात या वो दिन जब पूरी दुनिया एक साथ जश्न मना रही हो। दिल खोलकर दूसरे देश के लोगों को शाबासी दे रहा हो। वो भी उस वक्त जब सबकुछ प्रतियोगिता के बीच आंका जाता है। जब आगे-पीछे, जीत-हार के नज़रिये से सबकुछ देखा जा रहा हो। पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भी धोनी की तारीफ की थी, जिसे भारत के लिए नकारात्मक सोच रखनेवालों की श्रेणी में रखा जाता है। किसी वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि टीम इंडिया की हार पर दाऊद इब्राहिम भी रोता है। यानी क्रिकेट में कुछ तो है, जो बाकी किसी और में नहीं।
आईपीएल के ज़रिए क्रिकेट का भूमंडलीयकरण हुआ। धोनी चेन्नई के कप्तान बन गये। गौतम गंभीर दिल्ली के और शेन वार्न राजस्थान के। तमाम घेराबंदी को तोड़ते हुए ऑस्ट्रेलिया के खिलाड़ी राजस्थान के हो गये। इंग्लैंड के खिलाड़ी पंजाब के और वेस्टइंडीज के खिलाड़ी बेंगलुरू की ओर से खेलने लगे। क्रिकेट खेलते खेलते ऑस्ट्रेलिया के एडम गिलक्रिस्ट ने भारतीय बाजार में माल बेचने लगे पता नहीं चला। विज्ञापन के लिए ही सही हिन्दी बोलने लगे। ब्रेट ली ने तो बकायदा गाना तक रिकॉर्ड करवाया। घर बेचने लगे। साइमंड्स दोस्ती की नई परिभाषा गढ़ने आईपीएल के रास्ते बिग बॉस के घर तक पहुंच चुके हैं।
क्रिकेट पहले अंग्रेजों और कंगारुओं की बपौती हुआ करता था। ये उस अंग्रेजों का खेल था, जिसे भारतीय फूटी आंख देखना नहीं चाहते थे। लेकिन समय बदला तो भारत में क्रिकेट धर्म बनता गया। सचिन तेंदुलकर के रूप में क्रिकेट प्रेमियों को नया भगवान मिल गया। अंग्रेज भारतीयों के मुरीद बन गये। क्रिकेट के ज़रिए बंग्लादेश और किनिया जैसे मुल्क विश्व के मानचित्र पर पहचान बनाते हैं। चीन भी क्रिकेट टीम तैयार कर रहा है। हो सकता है कि बाज़ार को भांपते हुए अमेरिका भी जल्द ही अपनी टीम बना ले। यानी क्रिकेट के ज़रिए उम्मीद की नई किरण दिख रही है। जिसे समझने की और परखने की ज़रूरत है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. जोड़ने का तरीका अच्छा है...खेल जोड़ता है...ये भाषा की बांटने का काम तो नहीं कर रहा है...महाराष्ट्र और पूर्वी प्रदेश नहीं रहा ...भाषा सीखा रहा है...अपनों को नहीं ...सात समुन्द्र पार के लोगों को भी....

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  2. मेरा मानना है कि केल के पीछे इतना मत पागल हो जाओ कि अन्य केलों को भूल जाओ...अगर सही मायने में लोग खेल प्रेमी हैं तो अन्य खेलों को तवज्जो क्यों नहीं...अंकुर आपने बहुत ही अच्छा लिका है..अपनी लेखनी को इसी तरह गति देते रहना...मुरली मनोहर श्रीवास्तव.

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  3. मेरा मानना है कि केल के पीछे इतना मत पागल हो जाओ कि अन्य केलों को भूल जाओ...अगर सही मायने में लोग खेल प्रेमी हैं तो अन्य खेलों को तवज्जो क्यों नहीं...अंकुर आपने बहुत ही अच्छा लिका है..अपनी लेखनी को इसी तरह गति देते रहना...मुरली मनोहर श्रीवास्तव.

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