कॉर्पोरेट गरीब। यानी बड़ी कंपनी में कम सैलरी पर काम करने वाले कर्मचारी। ऊंची मत्वाकांक्षा। कुछ पाने की हसरत। मेहनत से सपने को हक़ीकत में बदलने का जज़्बा। आइरन किया हुआ शर्ट-पैंट। चमचमाते जूते। आंखों पर चश्मा। जो हर सुबह समय पर ऑफिस पहुंचता है। दिनभर कम्प्यूटर के साथ हाई प्रोफाइल माथापच्ची करता है। बॉस की गालियां सुनता है। दिल में दर्द लिए मुस्कुराते रहता है। महीने के सात तारीख को टाइट होता है। और आठ तारीख को कंगाल हो जाता है।
महीने के एक तारीख के बाद जेब में सिर्फ आईकार्ड और आने-जाने का भाड़ा रहता है। लेकिन रूतबा वैसा ही। ऑफिस के बाहर गार्ड जब सैल्यूट मारता है तो सीना अड़तालीस इंच चौड़ा हो जाता है। लोगों को पता है बड़ी कंपनी में काम करता है। बड़ा आदमी है। अदब से बात करो। बड़ी मुश्किल होती है। जब दुकानों में पर्सनैल्टी देखकर ऊंचा रेंज वाला सर्ट पैंट दिखता है। मन मसोस कर कहना पड़ता है कि पसंद नहीं है। गर्लफ्रेंड से झूठ बोलते-बोलते परेशान है। हर दिन नया बहाना। किसी तरह सात तारीख आ जाए। अभी तक घर का नालायक बेटा बना हुआ है। पापा को क्या बताएगा कि उनका बेटा कॉर्पोरेट गरीब है।
ऑफिस के कैंटीन में तीन सितारा होटल का मजा। खाते वक़्त नहीं। पैसा देते वक़्त महसूस होता है। जितना पैसा कर्च कर बाहर में दोपहर का लंच कर लूं उतने में नास्ता नहीं होता। बड़ी कंपनी का कैंटीन है भाई। प्राइस भी ऊंची है। दोस्तों के साथ बैठकर मुस्कुराते हुए खा लेता है। दोस्तों को कोई फर्क नहीं पड़ता। ऊंचा पोस्ट। ऊंची सैलरी। खाने के लिए बाहर जाना पर्सनैलटी पर पड़ता है। लेकिन गेहूं के साथ घुन भी पिस रहा है। जेब का दर्द रात में सोते समय यादों के जरिए बाहर आता है। दिल को बहलाता है। समझाता है। बेटा, सब ठीक हो जाएगा। लेकिन कब। कब तक कॉर्पोरेट गरीब बना रहूंगा। पता नहीं।
मंगलवार, सितंबर 13, 2011
बुधवार, अगस्त 24, 2011
भारत में अनशन
हिन्दुस्तान गांधी का देश है....जहां के लोगों का अनशन सबसे बड़ा हथियार है...अनशन के ज़रिए स्वतंत्रता की लड़ाई से लेकर भ्रष्टाचार के ख़िलाफ लड़ाई लड़ी जाती रही है....देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारी भगत सिंह ने भी अनशन का सहारा लिया था....1929 में भगत सिंह ने जेल में क़ैदियों के लिए बेहतर खाना, ठीक कपड़ा, किताब और अख़बारों की मांग कर रहे थे....63 दिनों तक ये अनशन चला था..इस दौरान भगत सिंह के साथी जतिन दास की मौत भी हो गई....अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी ने अंग्रेजों से भारत की आजादी की लड़ाई के दौरान 1922, 1930, 1933 और 1943 में अनशन किया। 1943 में तो महात्मा गांधी ने 21 दिन तक अनशन किया था......आज़ादी के बाद भी अपनी बात मनवाने के लिए अनशन बड़ा हाथियार बना रहा.....1952 में आंध्र प्रदेश के पोटि श्रीरामुलु ने भाषा के आधार पर मद्रास प्रेजिडेंसी से आंध्र प्रदेश के अलग होने के मुद्दे पर अशन किया...अनशन के 82वें दिन श्रीरामुलु की मौत हो गई....गौरक्षा के लिए 1966 में महात्मा रामचन्द्र वीर ने १६६ तक अनशन किया...को जगद्गुरु शंकराचार्य श्री निरंजनदेव तीर्थ ने ७२ दिन, संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने ६५ दिन, आचार्य श्री धर्मेन्द्र महाराज ने ५२ दिनों तक बिना अन्ना जल ग्रहण किये बैठे रहे...1967 में मास्टर तारा सिंह ने पंजाब सूबा बनाने के लिए 48 दिन तक अनशन किया था....आखिरी दिन तारा सिंह की मौत हो गई थी। हालांकि इसके चलते पंजाब को 3 राज्यों में बांट दिया गया....1974 में छात्र आंदोलन के बाद मोरारजी देसाई ने गुजरात विधानसभा भंग करने और उपचुनाव कराने की मांग को लेकर अनशन शुरू किया...उनके अनशन के दबाव में सरकार झुकी और उनकी मांगे मान ली गई....पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी 2006 में 25 दिनों तक अनशन की... ममता सिंगूर के किसानों की ली गई ज़मीन वापिस कराने की मांग कर रही थी....नर्मादा बचाओ आंदोलन से जुड़ी समाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटेकर बीस दिनों तक अनशन पर बैठी रही....तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर सांसद के चेन्द्रशेखर राव ने 2009 में ग्यारह दिनों तक अनशन किया....मणिपुर की इरोम चानू शर्मिला तो पिछले ग्यारह सालों से अनशन कर रही है...इरोम शर्मिला उत्तर पूर्व भारत से आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर ऐक्ट, 1958 को हटाने की मांग कर रही हैं...इसी तरह स्वामी निगमानंद ने राष्ट्रीय नदी गंगा में खनन रोकने के लिए 19 फरवरी 2011 से अनशन शुरू किया,,,लेकिन सरकार ने उनकी मांगों को तवज्जो नहीं दी... अनशन के 68वें दिन निगमानंद कोमा में चले गए और 12 जून 2011 की देर रात निगमानंद की मौत हो गई.....अब बात अन्ना की....गांधीवादी समाजसेवी अन्ना और अनशन का रिश्ता काफी पुराना रहा है....अब तक पंद्रह बार अनशन कर चुके अन्ना जनलोकपाल बिल की मांग को लेकर इसी साल पांच अप्रैल को दिल्ली के जंतर मंतर पर अनशन पर बैठे....97 घंटे बाद 9 अप्रैल, 2011 को सरकार ने लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए जॉइंट ड्राफ्ट कमिटी बनाने की घोषणा की जिसके बाद ही अन्ना ने अनशन तोड़ा। इसके बाद दिल्ली में बाबा रामदेव के आंदोलन के दौरान पुलिस कार्रवाई के विरोध में 8 जून को अन्ना ने राजघाट पर एक दिन का उपवास रखा। इसके पहले भी अन्ना महाराष्ट्र में करप्शन और आरटीआई के सवाल पर 2003 और 2006 में अनशन कर चुके हैं...उसके बाद बाबा रामदेव ने काले धन के मुद्दे पर 9 दिनों तक अनशन किया। तबियत खराब होने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया....सरकार ने उनकी मांगें नहीं मानी.....अन्त में उन्हें खुद अपना अनशन तोड़ना पड़ा....
शुक्रवार, अगस्त 05, 2011
इंतज़ार......
अमिताभ बच्चन। सदी के महानायाक। जितना बड़ा कद। जितना बड़ा नाम। वैसे ही देखने की तमन्ना। उनसे मिलने की ख्वाहिश। जब ज़िंदगी का सपना पूरा होने वाला होता है तो चेहरे पर क्या चमक होती है, ये हर किसी को देखकर लगता था। कोई बोलकर अपनी ख्वाहिश जता रहा था। तो किसी की मुस्कान हर लफ़्ज को बया कर रही थी। जिसे सिर्फ सिनेमा के पर्दे पर या टीवी पर देखा था। उसे नजदीक से देखने की हसरत पूरी होने वाली है। हर किसी ने अपने पहचान वालों को फोन कर दिया। आज अमिताभ को देखेंगे। हाथ मिलाएंगे। ऑटोग्राफ लेना है। फोटो खिंचवाना है। ऐसा लग रहा था, जैसे चांद धरती पर उतर रहा हो।
जितनी बड़ी शख्सियत उतनी ही बड़ी इंतज़ार की घड़ियां। पटना में मौर्य के ऑफिस आने की सूचना मिली। सुबह आठ बजे से इंतज़ार शुरू। मौर्य के कर्मचारियों की। उन प्रशंसकों की, जो उनकी एक झलक पाने के लिए मौर्य ऑफिस के बाहर खड़े थे। लोगों में एक अजीब उत्सुकता दिखी। पहलीबार किसी महानायक से मिलने के लिए इतना बड़ा दीवानपन देखा। पागलपन देखा। नजदीक से देखा, महानायक के प्रशंसकों को। कोई वर्ग नहीं। कोई आयु नहीं। साठ पार कर चुकी महिलाएं। सड़क पर स्कूली बच्चों की ऐसी कतार लगी थी, जैसे स्कूल में छुट्टी दे दी गई हो। हर निगाहें शहंशाह को ढूंढ़ रही थी। ना जाने कब आएंगे। सामने छत पर दो लड़के, यूं बैठे थे मानों दीवार का विजय और रवि हो। कौन था पता नहीं। लेकिन दोनों की आतुरता देखते बनती थी।
वक़्त के साथ मन की अकुलाहट भी बढ़ती जा रही थी। आख़िर कब ख़त्म होगी इंतज़ार की घड़ी। छह घंटे तक यूं ही इंतज़ार होता रहा। लेकिन वो नहीं आए। आया तो उम्मीदों को तोड़ने वाला संदेश। अमिताभ दिल्ली चले गये। लंबे इंतज़ार के बाद उम्मीदों का बिखरना क्या होता है, हर चेहरे पर झलक रहा था। क्यों नहीं आए अमिताभ। पांच मिनट के लिए आ ही जाते तो क्या हो जाता। कौन सी आफ़त टूट पड़ती। भूखे प्यासे इंतज़ार करता रहा। ऐसे थोड़े ही होता है। जितनी मुंह, उतनी बातें। लेकिन हक़ीक़त की हवा अपने झोंके के साथ सपनों का आशियाना उड़ा ले गया।
जितनी बड़ी शख्सियत उतनी ही बड़ी इंतज़ार की घड़ियां। पटना में मौर्य के ऑफिस आने की सूचना मिली। सुबह आठ बजे से इंतज़ार शुरू। मौर्य के कर्मचारियों की। उन प्रशंसकों की, जो उनकी एक झलक पाने के लिए मौर्य ऑफिस के बाहर खड़े थे। लोगों में एक अजीब उत्सुकता दिखी। पहलीबार किसी महानायक से मिलने के लिए इतना बड़ा दीवानपन देखा। पागलपन देखा। नजदीक से देखा, महानायक के प्रशंसकों को। कोई वर्ग नहीं। कोई आयु नहीं। साठ पार कर चुकी महिलाएं। सड़क पर स्कूली बच्चों की ऐसी कतार लगी थी, जैसे स्कूल में छुट्टी दे दी गई हो। हर निगाहें शहंशाह को ढूंढ़ रही थी। ना जाने कब आएंगे। सामने छत पर दो लड़के, यूं बैठे थे मानों दीवार का विजय और रवि हो। कौन था पता नहीं। लेकिन दोनों की आतुरता देखते बनती थी।
वक़्त के साथ मन की अकुलाहट भी बढ़ती जा रही थी। आख़िर कब ख़त्म होगी इंतज़ार की घड़ी। छह घंटे तक यूं ही इंतज़ार होता रहा। लेकिन वो नहीं आए। आया तो उम्मीदों को तोड़ने वाला संदेश। अमिताभ दिल्ली चले गये। लंबे इंतज़ार के बाद उम्मीदों का बिखरना क्या होता है, हर चेहरे पर झलक रहा था। क्यों नहीं आए अमिताभ। पांच मिनट के लिए आ ही जाते तो क्या हो जाता। कौन सी आफ़त टूट पड़ती। भूखे प्यासे इंतज़ार करता रहा। ऐसे थोड़े ही होता है। जितनी मुंह, उतनी बातें। लेकिन हक़ीक़त की हवा अपने झोंके के साथ सपनों का आशियाना उड़ा ले गया।
सोमवार, जुलाई 25, 2011
यही राजनीति है.....
कभी खुद को रॉबिन हूड से तुलना करने वाले लालू प्रसाद यादव राजनीति के हाशिए पर खड़े हैं। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद से लालू और उनकी पार्टी मजधार में फंसी है। जो लालू कभी केन्द्र में सरकार बनाने और बिगाड़ने का माद्दा रखते फिरते थे, वो आज खुद एक अदद मंत्री बनने के लिए सोनिया गांधी के घर का चक्कर काट रहे हैं। बिहार के जिन नेताओं आसरे लालू हूंकार भरते थे, आज वे एक एक कर उनका साथ छोड़ रहे हैं। जब तक लालू राजनीति के शेर थे। दहाड़ रहे थे। तो तमाम चाटुकार उनके आगे पीछे दूम हिलाते फिरते थे। लेकिन शेर बूढ़ा क्या हुआ, उनके नाम पर सत्ता का सुख भोगने वाले एक एककर दूम दबाकर भागने लगे।
बिहार में ही राष्ट्रीय जनता दल की ये स्थिति होगी, लालू ने कभी सोचा भी नहीं था। लालू ने बिहार की राजनीति में जो चाहा, जब चाहा, उसे डंके की चोट पर कर दिखाया। जिसको चाहा नेता बना दिया। जिसको चाहा मटियामेट कर दिया। शरद यादव ने बात नहीं मानी तो अलग पार्टी बना ली। विरोधी मिमियाते रहे और लालू राज करते रहे। लेकिन समय बदला। लोगों का मिज़ाज बदला। और लालू का राज बदल गया। एक बार कुर्सी क्या गई, मानों मौक़ापरस्ती की रानजनीति करने वाले बिहार के नेताओं ने रंग बदलना शुरू कर दिया। जिन नेताओं को लालू ने नाम दिया। पहचान दी। राजनीति का पाठ पढ़ाया। आज उन्हीं लोगों को लालू की नीति अच्छी नहीं लग रही है। वे उन्हें ही नसीहतें दे रहे हैं। साथ छोड़ रहे हैं।
दरअसल यही राजनीति है। जिसके पास सत्ता होती है। पावर होता है। उसी का सबकुछ होता है। लोकतंत्र के नाम पर कुर्सी का खेल करनेवालों के लिए ये एक कड़वी सच्चाई है। ये संकेत हैं उन तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के लिए, जो निजी कंपनी की तरह चलाया जाता है। जो पार्टियां एक ही परिवार के आसरे चलती है। उसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और कार्यकर्ताओं का चुनाव राजतंत्र सरीखे होता है। मसलन बिहार में राजद, जदयू, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी, उड़ीसा में बीजू जनता दल, तमिलनाडू में डीएमके और एआईडीएमके, कर्नाटक में दनतादल सेक्यूलर, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाले तेलगू देशम पार्टी। इन तमाम पार्टियों की अगुवाई एक ख़ास शख्स के द्वारा किया जाता है। जिसे वो चाहता है, उसे वहां तक पहुंचा देता है। लालू यादव ने भी यही काम किया। जिसका खामिया आज उन्हें भुगतना पड़ रहा है।
बिहार में ही राष्ट्रीय जनता दल की ये स्थिति होगी, लालू ने कभी सोचा भी नहीं था। लालू ने बिहार की राजनीति में जो चाहा, जब चाहा, उसे डंके की चोट पर कर दिखाया। जिसको चाहा नेता बना दिया। जिसको चाहा मटियामेट कर दिया। शरद यादव ने बात नहीं मानी तो अलग पार्टी बना ली। विरोधी मिमियाते रहे और लालू राज करते रहे। लेकिन समय बदला। लोगों का मिज़ाज बदला। और लालू का राज बदल गया। एक बार कुर्सी क्या गई, मानों मौक़ापरस्ती की रानजनीति करने वाले बिहार के नेताओं ने रंग बदलना शुरू कर दिया। जिन नेताओं को लालू ने नाम दिया। पहचान दी। राजनीति का पाठ पढ़ाया। आज उन्हीं लोगों को लालू की नीति अच्छी नहीं लग रही है। वे उन्हें ही नसीहतें दे रहे हैं। साथ छोड़ रहे हैं।
दरअसल यही राजनीति है। जिसके पास सत्ता होती है। पावर होता है। उसी का सबकुछ होता है। लोकतंत्र के नाम पर कुर्सी का खेल करनेवालों के लिए ये एक कड़वी सच्चाई है। ये संकेत हैं उन तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के लिए, जो निजी कंपनी की तरह चलाया जाता है। जो पार्टियां एक ही परिवार के आसरे चलती है। उसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और कार्यकर्ताओं का चुनाव राजतंत्र सरीखे होता है। मसलन बिहार में राजद, जदयू, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजपार्टी, उड़ीसा में बीजू जनता दल, तमिलनाडू में डीएमके और एआईडीएमके, कर्नाटक में दनतादल सेक्यूलर, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाले तेलगू देशम पार्टी। इन तमाम पार्टियों की अगुवाई एक ख़ास शख्स के द्वारा किया जाता है। जिसे वो चाहता है, उसे वहां तक पहुंचा देता है। लालू यादव ने भी यही काम किया। जिसका खामिया आज उन्हें भुगतना पड़ रहा है।
रविवार, दिसंबर 12, 2010
पटना पुस्तक मेला २०१०
पटना के गांधी मैदान में किताबों का महाकुंभ लगा है। जबर्दस्त भीड़ जुट रही है। तरह-तरह की किताबें बिक रही है। स्कूली किताब से लेकर साहित्य, रोमांस, इतिहास की किताबें। अगर आप रोमांटिक आदमी हैं और उम्रदराज होकर कुछ कर गुजरना चाहते हैं तो जूली-मटूक की डायरी भी मिल रही है। हां, गीता की बिक्री कम या नहीं के बराबर है। एक विदेशी हाथ में लेकर घूम घूम कर बेच रहा था। एक लेखक देश की भी चिंता है। वैसे इश्क लड़ाने वालों के लिए भी कम मनमाफित जगह नहीं है। आईलवयू करने वाले लोग भी खूब घूम रहे हैं। किताब देखने वालों से ज्यादा किताब देखने वाले को देखनेवालों की भीड़ है। पुस्तक मेला में हर तरह के प्रोडक्ट बेचे जा रहे हैं। किताबों के साथ-साथ पॉपकॉर्न भी खूब बिक रहे हैं। दिसम्बर महीने में भी कोकाकोला की बिक्री है। एक बात और ख़ास है। यहां पर 12 दिनों में पत्रकार बना दिये जाते हैं। इंजीनियरिंग, मेडिकल, और समान्य कंपिटिशन के लिए प्राइवेट इंस्टीट्यूटों के बीच जबर्दस्त कंपिटिशन है। कुछ तस्वीरों के जरिये हम आपको दिखाते हैं।


















सोमवार, दिसंबर 06, 2010
लॉज का रोमांस
लोगों ने प्राइवेट हॉस्टल के नाम को ओवरहॉलिंग करते-करते लॉज बना दिया। जो छोटे बड़े हर शहर के गली मुहल्ले में मिल जाएंगे। जहां रेगिस्तान के वक्ष पर हराभरा सुनहरा जंगल बसाने की ख्वाहिस लिए लाखों बच्चे रहते हैं। वही बच्चे जो बगिया से टूटकर मुरझाये हुए फुलों की तरह सालों तक निर्वासित जीवन व्यतित करते हैं।
शुरू-शुरू में ये किसी सज़ा से कम नहीं होता। लेकिन मजबूरी इसे मजा में बदल देती है। शुरू होता है ज़िंदगी का एक नया ड्रामा। उस ड्रामे में सबकुछ है। इमोशन है। प्यार है। एक्शन भी और सबसे ज्यादा भविष्य के गर्भ में छुपा ज़िंदगी का सस्पेंस भी। जहां कई कठोर निर्णय खुद लेने पड़ते हैं। जहां हर कदम फिसलनदार ज़मीन पर रखना पड़ता है। खुद को खुद से संभालना पड़ता है।
धीरे-धीरे बच्चे इस लॉज को अपना सबकुछ बना लेते हैं। 12 बाइ 12 के रूम की तुलना मुकेश अंबानी के एंटिलिया से होने लगती हैं। एक ही कमरा में पूरा फ्लैट। एक तरफ मां सरस्वती का फोटो तो दूसरी ओर बलखाती, इतराती, मुस्कुराती अर्धनग्नावस्था में किसी हिरोइन का पोस्टर। जो आशिकिया मिज़ाज को पुख्ता करता है। रूम पार्टनर पारिवारिक सदस्य हो जाते हैं। जिससे कभी रोटी की दोस्ती तो कभी भात का बैर। जो भी हो, बीमार पड़ने पर दवा तो वही लाकर देता है।
इस सब के बावजूद एक बात ख़ास होती है। वो ये कि यहां हर कोई एक दूसरे को निकृष्ट जीव समझता है। हर कोई एक दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है। एक ऐसी सोच जनती है जहां खुद को क्रेजी साबित करने की होड़ लगी रहती है। फ्लर्ट करने की हसरत लिए सच्ची झूठी कहानी गढ़ी जाती है।
यहां के रहन-सहन में कोई बंधे बंधाये नियम नहीं होते। कोई कसाव नहीं होता। हर काम में स्वच्छंदता रहती है। एक बिखरी हुई सी अनियमितता रहती है। जहां हर दिन एक रूटीन चार्ट बनता है। शाम होते-होते उसमें परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, अगले दिन रुटीन खत्म और अगले सप्ताह फिर से नया चार्ट बनकर तैयार हो जाता है।
मीडिल क्लास फैमिली के बच्चे यहां आकर मनी मैनेजमेंट में पक्के हो जाते हैं। दो हज़ार रुपये में पूरा महीना मैनेज करने की कला कोई इनसे सीखें। मेस चलाना है। ट्यूशन फी देना है। कॉपी और किताब भी खरीदनी है। और फिल्म का खर्चा भी निकालना है। पैसा जोड़-जोड़ इकट्टा करके फिल्म देखने का उत्साह, इंसा अल्लाह। रिलिजिंग डेट पर फिल्म देखने का मजा यहां के बच्चों से ज्यादा भला कौन जान सकता है। जेब में पैसा रहे ना रहे, रूतबा तो मुमताज के शाहजहां वाला चाहिए ही। तभी लड़की भी पटेगी।
लॉज में दिन की शुरुआत बड़े ही मजेदार तरीके से होती है। आंख मलते हुए ट्वायलेट जाना। नंबर लगाना पड़ता है। क़िस्मत अच्छी रही तो जल्दी, वरना कभी-कभी फिर से एक नींद सोकर उठ जाइये, तब नंबर आयेगा। तभी तो स्वयंभू स्मार्ट लड़के आठ बजे के बाद ही सोकर उठने की चालाकी करते हैं। लेकिन स्नान करने के समय तो यहां पूरा समाजवाद दिखता है। सिक्स पैक बॉडी की तमन्ना रखने वाले तमान बच्चे जब एक साथ नहाने के लिए जमा होते हैं तो देखते ही बनाता है।
गैस ने हॉस्टल में नई क्रांति ला दी। स्टोव की सनसनाहट बंद हो गये। हां, कुकर की सिटी जरूर आवाज लगाती है। एक ही साथ कई कमरे से आवाज निकलती है। एक ही बार में बीडीसी बनकर तैयार। बीडीसी, यानी भात, दाल, चोखा की छात्रप्रियता में आज भी कोई कमी नहीं आई है। ये आज भी छात्रों का फेवरेट है। फटाफट एक ही साथ बनकर तैयार। मन किया तो छौंका लगा दिया, नहीं तो थाली भरकर भात, उसके उपर आलू का चोखा और बाटी में दाल। खाते समय किसी फाइव स्टार होटल से कम स्वादिष्ट नहीं लगता। यहां के खाने में एक और ख़ासियत होता है कि यहां कुछ भी ज्यादा नहीं बनता। जो भी बनता है, सबका उदरभाजन हो जाता है।
खैर, जो भी हो इस सब के बावजूद यहीं बुना जाता है जिंदगी का तानाबाना, सपनों में लगते हैं पंख। कोई इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करता है। कोई मेडिकल की परीक्षा पास करता है। यहीं कोई मैनेजमेंट की तैयारी का निर्णय लेता है तो कोई जेनरल कंपिटिशन में क़िस्मत आजमाने के लिए घुस जाते हैं।
शुरू-शुरू में ये किसी सज़ा से कम नहीं होता। लेकिन मजबूरी इसे मजा में बदल देती है। शुरू होता है ज़िंदगी का एक नया ड्रामा। उस ड्रामे में सबकुछ है। इमोशन है। प्यार है। एक्शन भी और सबसे ज्यादा भविष्य के गर्भ में छुपा ज़िंदगी का सस्पेंस भी। जहां कई कठोर निर्णय खुद लेने पड़ते हैं। जहां हर कदम फिसलनदार ज़मीन पर रखना पड़ता है। खुद को खुद से संभालना पड़ता है।
धीरे-धीरे बच्चे इस लॉज को अपना सबकुछ बना लेते हैं। 12 बाइ 12 के रूम की तुलना मुकेश अंबानी के एंटिलिया से होने लगती हैं। एक ही कमरा में पूरा फ्लैट। एक तरफ मां सरस्वती का फोटो तो दूसरी ओर बलखाती, इतराती, मुस्कुराती अर्धनग्नावस्था में किसी हिरोइन का पोस्टर। जो आशिकिया मिज़ाज को पुख्ता करता है। रूम पार्टनर पारिवारिक सदस्य हो जाते हैं। जिससे कभी रोटी की दोस्ती तो कभी भात का बैर। जो भी हो, बीमार पड़ने पर दवा तो वही लाकर देता है।
इस सब के बावजूद एक बात ख़ास होती है। वो ये कि यहां हर कोई एक दूसरे को निकृष्ट जीव समझता है। हर कोई एक दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है। एक ऐसी सोच जनती है जहां खुद को क्रेजी साबित करने की होड़ लगी रहती है। फ्लर्ट करने की हसरत लिए सच्ची झूठी कहानी गढ़ी जाती है।
यहां के रहन-सहन में कोई बंधे बंधाये नियम नहीं होते। कोई कसाव नहीं होता। हर काम में स्वच्छंदता रहती है। एक बिखरी हुई सी अनियमितता रहती है। जहां हर दिन एक रूटीन चार्ट बनता है। शाम होते-होते उसमें परिवर्तन होना शुरू हो जाता है, अगले दिन रुटीन खत्म और अगले सप्ताह फिर से नया चार्ट बनकर तैयार हो जाता है।
मीडिल क्लास फैमिली के बच्चे यहां आकर मनी मैनेजमेंट में पक्के हो जाते हैं। दो हज़ार रुपये में पूरा महीना मैनेज करने की कला कोई इनसे सीखें। मेस चलाना है। ट्यूशन फी देना है। कॉपी और किताब भी खरीदनी है। और फिल्म का खर्चा भी निकालना है। पैसा जोड़-जोड़ इकट्टा करके फिल्म देखने का उत्साह, इंसा अल्लाह। रिलिजिंग डेट पर फिल्म देखने का मजा यहां के बच्चों से ज्यादा भला कौन जान सकता है। जेब में पैसा रहे ना रहे, रूतबा तो मुमताज के शाहजहां वाला चाहिए ही। तभी लड़की भी पटेगी।
लॉज में दिन की शुरुआत बड़े ही मजेदार तरीके से होती है। आंख मलते हुए ट्वायलेट जाना। नंबर लगाना पड़ता है। क़िस्मत अच्छी रही तो जल्दी, वरना कभी-कभी फिर से एक नींद सोकर उठ जाइये, तब नंबर आयेगा। तभी तो स्वयंभू स्मार्ट लड़के आठ बजे के बाद ही सोकर उठने की चालाकी करते हैं। लेकिन स्नान करने के समय तो यहां पूरा समाजवाद दिखता है। सिक्स पैक बॉडी की तमन्ना रखने वाले तमान बच्चे जब एक साथ नहाने के लिए जमा होते हैं तो देखते ही बनाता है।
गैस ने हॉस्टल में नई क्रांति ला दी। स्टोव की सनसनाहट बंद हो गये। हां, कुकर की सिटी जरूर आवाज लगाती है। एक ही साथ कई कमरे से आवाज निकलती है। एक ही बार में बीडीसी बनकर तैयार। बीडीसी, यानी भात, दाल, चोखा की छात्रप्रियता में आज भी कोई कमी नहीं आई है। ये आज भी छात्रों का फेवरेट है। फटाफट एक ही साथ बनकर तैयार। मन किया तो छौंका लगा दिया, नहीं तो थाली भरकर भात, उसके उपर आलू का चोखा और बाटी में दाल। खाते समय किसी फाइव स्टार होटल से कम स्वादिष्ट नहीं लगता। यहां के खाने में एक और ख़ासियत होता है कि यहां कुछ भी ज्यादा नहीं बनता। जो भी बनता है, सबका उदरभाजन हो जाता है।
खैर, जो भी हो इस सब के बावजूद यहीं बुना जाता है जिंदगी का तानाबाना, सपनों में लगते हैं पंख। कोई इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करता है। कोई मेडिकल की परीक्षा पास करता है। यहीं कोई मैनेजमेंट की तैयारी का निर्णय लेता है तो कोई जेनरल कंपिटिशन में क़िस्मत आजमाने के लिए घुस जाते हैं।
मंगलवार, नवंबर 23, 2010
राहुल और सोनिया पर घोटाले का आरोप नहीं है....
इस साल देश में कुछ ही दिनों के अंतराल में एक एक कर पांच घोटालों का पर्दाफाश हुआ। ख़ास बात है कि पांच में से चार घोटलों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस शामिल रही है। वही कांग्रेस जिसका नारा है "कांग्रेस का हाथ,आम आदमी के साथ"। वही कांग्रेस जिसके नेता राहुल गांधी युवाओं के जरिये कुर्सी पर काबिज होकर देश को नई दशा और दिशा तय करने में जुटे हैं। काबिल-ए-गौर है कि इन तमाम घोटालों में तथाकथित युवा नेताओं का नाम आ रहा है।
सबसे पहले बात करते हैं देश के अब तक के सबसे बड़े टू जी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले की। कांग्रेस की सरकार में संचार मंत्री रहे ए राजा पर एक लाख सत्तर हजार करोड़ रूपयों के घोटाले का आरोप है। विपक्ष के दबाव में राजा को इस्तीफा देना पड़ा। हलांकि राजा डीएमके के नेता हैं, लेकिन वो मंत्री कांग्रेस सरकार में हैं। साथ ही जब विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेर रहा था तो कांग्रेसी नेता राजा का बचाव कर रहे थे।
इस साल का दूसरा सबसे बड़ा घोटाला कॉमन वेल्थ गेम्स में सामने आया है। जो लगभग 87 हजार करोड़ के आसपास का है। इसमें भी कांग्रेसी नेताओं पर आरोप लगे हैं। ख़ासकर सुरेश कलमाड़ी पर। जो भारतीय कॉमन वेल्थ गेम्स के अध्यक्ष भी हैं। और कांग्रेस के सांसद भी। यहां भी किरकीरी होने पर कांग्रेस, कलमाड़ी पर कार्रवाई कर चुकी है।
ऐसे ही खेल से ही जु़ड़ा दूसरा मामला है इंडियन प्रीमियर लीग का। इस मामले में फंसकर कांग्रेस के तेजतर्रार नेता और मंत्री शशि थरूर अपना इस्तीफा दे चुके हैं। पार्टी को इस मामले में कितनी फजीहत हुई, इसे कहने की ज़रूरत नहीं है।
और सबसे ताज़ा मामला आदर्श सोशाएटी घोटाले का है। जिसका आरोप महाराष्ट्र के तत्कालिन मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण पर लगे हैं। चव्हाण को भी इस्तीफा देना पड़ा। ख़ास बात ये है कि चव्हाण महाराष्ट्र के पहले कांग्रेसी मुख्यमंत्री नहीं हैं, जिन पर घोटाला का आरोप लगा है। ए आर अंतुले, सुशील कुमार शिंदे जैसे कई दिग्गजों के दामन घोटलों के आरोप में दागदार हो चुके हैं।
गिनती यहीं पर आकर खत्म नहीं होती है। फेहरिस्त काफी लंबी है। अगर थोड़ा और भी पुराने फाइलों को खंगालें तो कई और नाम कांग्रेस को शर्मसार करते नज़र आएंगे। पहले बात बोफोर्स घोटाले की। जिसमें कांग्रेस के सबसे युवा और सशक्त प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर आरोप लगा था। उसके बाद हवाला कांड सामने आया तो उसमें पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव पर आरोप लगे। इतना ही नहीं, नरसिम्हा राव पर तो सरकार बचाने के लिए खरीद फरोख्त का भी आरोप है। इसके अलावा पूर्व संचार मंत्री पंडित सुखराम घोटाले के आरोप जेल जा चुके हैं। पहली बार सुखराम के बेड के नीचे से ही पैसा निकला था। इराक का तेल के बदले डॉलर घोटाले में काग्रेस के वरिष्ठ मंत्री नटवर सिंह और उनके परिजन पर आरोप हैं। जिसके बाद नटवर सिंह को विदेश मंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी। अर्जुन सिंह सरीखे कई नेताओं पर भी घोटालों के आरोप है।
इनके अलावा वर्तमान राजनीति के और भी कई दिग्गज हैं जो घोटाले को अपने दामन में छुपाये सत्ता के सहारे आदर्शवाद का मुखौटा पहने घूम रहे हैं या इस दुनिया से विदा हो गये हैं। वैसे आरोप तो यहां तक है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री ललित नारायण मिश्रा की हत्या इसलिए हुई थी क्योंकि उन्हें जानकारी थी कि संजय गांधी ने कहां हेरफेर किया है। हलांकि इसका कोई लिखित तौर पर पुख्ता प्रमाण नहीं हैं।
अब थोड़ा इससे आगे बढ़ते हैं। बात चारा घोटाला का करते हैं। जिसके नायक लालू प्रसाद यादव थे। उन्हें कांग्रेस का समर्थन हासिल था। हलांकि चारा घोटाले में पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा भी आरोपी हैं।
इसी तरह 2009 में सामने आया कोड़ा घोटाला मामला। एक नवनिर्मित और गरीब राज्य के मुख्यमंत्री ने तब घोटालों का सारा रिकॉर्ड तोड़ दिया था। मधु कोड़ा ने पूरे दस हजार करोड़ का गबन कर लिया था। एक निर्दलीय मुख्यमंत्री को कांग्रेस का समर्थन था। वैसे भी जिस तरह कोड़ा ने विदेशों में पैसा भेजा वो केन्द्र सरकार के जानकारी के बिना संभव नहीं है। और केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी।
इन तमाम बातों से इतना तो साफ है कि जितने भी बड़े घोटाले हुए हैं उसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस शामिल रही है। लेकिन इस सब के बावजूद देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी के लिए एक राहत की बात ये है कि राहुल और सोनिया गांधी पर घोटालों के आरोप नहीं लगे हैं। लेकिन विपक्ष ये भी कहने से गुरेज नहीं कर रहा है कि कई घोटाले इन दोनों के संरक्षण के बिना संभव नहीं हुआ।
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